Select Language :

Home » ब्रेकिंग न्यूज़ » मुजफ्फरनगर: रामपुर तिराहा कांड में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट ब्रजकिशोर समेत तीन पुलिसकर्मी दोषी, सीबीआई जांच में खुली पुलिस की फर्जी कहानी

मुजफ्फरनगर: रामपुर तिराहा कांड में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट ब्रजकिशोर समेत तीन पुलिसकर्मी दोषी, सीबीआई जांच में खुली पुलिस की फर्जी कहानी

पुलिस ने थमाए आंदोलनकारियों के मत्थे मढ़े थे देश तमंचे और कारतूस
लोकपथ लाइव, मुजफ्फरनगर: मुजफ्फरनगर की विशेष सीबीआई अदालत द्वारा रामपुर तिराहा कांड से जुड़े ‘फर्जी हथियार बरामदगी’ मामले में तत्कालीन छपार थानाध्यक्ष ब्रजकिशोर समेत तीन पूर्व पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिया गया है। इस फैसले ने साबित कर दिया है कि यह मामला सिर्फ एक सामान्य पुलिसिया लापरवाही का नहीं था, बल्कि अलग राज्य की मांग कर रहे निहत्थे नागरिकों पर ढहाए गए जुल्म और फिर उसे छिपाने के लिए रची गई एक बेहद संगीन और सुनियोजित साजिश का हिस्सा था।

How to Make a News Portal

घटना के अनुसार 1-2 अक्टूबर 1994 अलग ‘उत्तराखंड राज्य’ के गठन की मांग को लेकर हजारों आंदोलनकारी बसों में सवार होकर अपनी आवाज बुलंद करने देहरादून और कुमाऊं-गढ़वाल के इलाकों से दिल्ली (राजघाट) की तरफ कूच करते समय मुजफ्फरनगर जिले के रामपुर तिराहा पर बैरिकेडिंग व नाकेबंदी करके रोक दिया गया। जिला प्रशासन ने यह कार्रवाई तत्काली सीएम मुलायम सिंह यादव के निर्देश पर की थी। यही नहीं रात में पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच बहस शुरू के बाद बल प्रयोग और हिंसक घटना के तहत पुलिस ने निहत्थे आंदोलनकारियों पर बेरहमी से लाठीचार्ज किया, आंसू गैस के गोले छोड़े और फिर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। इस सरकारी आधा दर्जन से ज्यादा आंदोलनकारियों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि दर्जनों लोग घायल हुए थे। वहीं पुलिसकर्मियों पर आंदोलनकारी महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म और छेड़छाड़ जैसे बेहद संगीन आरोप भी लगाए गये थे।

पुलिस ने अपने बचाव में कई तरह की कहानी गढ़ी
इस कांड के बाद देशभर यूपी पुलिस और सरकार ने अपनी फजीयत से बचने के लिए कई फर्जी कहानियां गढ़ी, जिसका मकसद पुलिस को खुद को बचाने और अपनी फायरिंग को जायज ठहराना था। पुलिस ने आंदोलनकारियों को हिंसक ठहराने के इरादे से उनके पास फर्जी हथियार और कारतूस तथा अन्य सामान दिखाकर उन पर पुलिस दलों पर फायरिंग करने का दावा शुरु कर दिया था, ताकि साबित हो सके कि पुलिस को आत्मरक्षार्थ गोली चलानी पड़ी। अपने इसी झूठे दावे को सच साबित करने के लिए तत्कालीन थाना प्रभारी (एसएचओ) बृजकिशोर और उनके सिपाही उमेश चंद व अनिल कुमार ने आंदोलन की अगवाई कर रहे और गिरफ्तार किए गए निर्दोष आंदोलनकारियों के नाम पर फर्जी जब्ती मेमो तैयार किए। पुलिस ने कागजों पर दिखाया कि आंदोलनकारियों के पास से भारी मात्रा में अवैध तमंचे (कट्टे), जिंदा कारतूस और धारदार हथियार बरामद हुए हैं।

सीबीआई जांच में खुला पुलिस के झूठे राज का चिट्ठा
सीबीआई जांच में यह वैज्ञानिक और दस्तावेजी रूप से साबित हुआ कि जो हथियार आंदोलनकारियों से बरामद दिखाए गए थे, वे असल में पुलिस ने खुद मालखाने या अन्य स्रोतों से लाकर वहां रखे थे। इस क्रूरता के खिलाफ उत्तराखंड के कार्यकर्ताओं ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंप दी। यही नहीं जिन गवाहों के दस्तखत जब्ती मेमो पर थे, उन्होंने सीबीआई को बताया कि उनसे डरा-धमकाकर खाली कागजों पर दस्तखत कराए गए थे। सीबीआई ने साफ कर दिया कि पुलिस ने आंदोलनकारियों को बदनाम करने और अदालतों को गुमराह करने के लिए ‘फर्जी साक्ष्य’ गढ़े थे। सीबीआई ने इस मामले में तत्कालीन एसएचओ बृजकिशोर, सिपाही उमेश चंद और अनिल कुमार के खिलाफ धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने (IPC 467, 468, 471) और साजिश रचने (IPC 120B) के तहत चार्जशीट दाखिल की थी।

आखिर तीन दशक बाद मिला न्याय
पिछले 32 वर्षों से यह केस मुजफ्फरनगर की कचहरी में चल रहा था। आज विशेष सीबीआई कोर्ट ने माना कि रक्षक ही भक्षक बने थे और उन्होंने कानून की वर्दी पहनकर न्याय प्रणाली के साथ खिलवाड़ किया था। मंगलवार को कोर्ट ने इन तीनों को इसी ‘फर्जी हथियार’ कांड का मुख्य सूत्रधार मानते हुए दोषी करार दिया है। उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में इस फैसले को एक मील का पत्थर माना जा रहा है, जिसने साबित कर दिया कि सत्ता और वर्दी की हनक में लिखे गए झूठ की उम्र चाहे कितनी भी लंबी हो, जीत हमेशा सच की ही होती है।

Share this post:

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

खबरें और भी हैं...

वोट करें

[democracy id="1"]

Our Visitor

1 2 1 3 7 5
Total views : 356548

Follow us on