
केंद्र सरकार ने डीएपी सब्सिडी बढ़ाकर 29,805 रुपये प्रति टन की
रबी सीजन में 37,952 करोड़ रुपये के उर्वरक की आवश्यकता का अनुमान
लोकपथ लाइव, नई दिल्ली (ओ.पी. पाल): केंद्र की मोदी सरकार ने देश के किसानों को वैश्विक बाजार में कच्चे माल की कीमतों में अनिश्चितता और किसानों को महंगाई से बचाने के मकसद से रबी सीजन 2025-26 के लिए डीएपी सब्सिडी बढ़ाकर 29,805 रुपये प्रति टन कर दी गई है। सरकार ने 37,952 करोड़ रुपये की उर्वरक आवश्यकता का अनुमान लगाया है।


केद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, उर्वरक सब्सिडी में यह बढ़ोतरी मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उर्वरकों और कच्चे माल की अस्थिर कीमतों को देखते हुए की गई है। किसानों पर लागत का बोझ न पड़े, इसके लिए सरकार ने पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना के तहत सब्सिडी दरों में, विशेषकर डाय-अमोनियम फॉस्फेट (डीएपी) के लिए, भारी वृद्धि की है। डीएपी पर सब्सिडी पिछले वर्ष के 21,911 रुपये प्रति टन से बढ़ाकर 29,805 रुपये प्रति टन कर दी गई है। सरकार ने इस सीजन के लिए 37,952 करोड़ रुपये की अनुमानित उर्वरक आवश्यकता तय की है, जो खरीफ 2025 सीजन के मुकाबले करीब 736 करोड़ रुपये अधिक है। यह कदम न केवल बुवाई के आगामी सीजन में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करेगा, बल्कि मृदा स्वास्थ्य को संतुलित बनाए रखने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण नीतिगत पहल है। वहीं इस निर्णय का सीधा लाभ गेहूं, तिलहन और दालों की खेती करने वाले किसानों को मिलेगा, क्योंकि रबी सीजन इन फसलों की बुवाई का मुख्य समय होता है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पीक सीजन के दौरान किसानों को किफायती दरों पर उर्वरक उपलब्ध होते रहें।

एनबीएस योजना में: संतुलित खेती को बढ़ावा
पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (एनबीएस) योजना, जिसे भारत सरकार ने 1 अप्रैल 2010 से लागू किया था, उर्वरक क्षेत्र में एक बड़ा नीतिगत बदलाव मानी जाती है। यूरिया के अत्यधिक उपयोग के विपरीत अब एनबीएस ढांचा उर्वरकों में मौजूद पोषक तत्वों यानी नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश और सल्फर के आधार पर सब्सिडी तय करता है। रबी 2025–26 के लिए नाइट्रोजन पर 43.02 रुपए प्रति किलोग्राम और फॉस्फेट पर 47.96 रुपए प्रति किलोग्राम की सब्सिडी तय की गई है। इसी वजह से इस बार डीएपी खाद पर सब्सिडी बढ़कर 29,805 रुपए प्रति मीट्रिक टन हो गई है, जो रबी 2024–25 में 21,911 रुपए प्रति मीट्रिक टन थी। गौरतलब है कि वर्षों तक नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के असंतुलित प्रयोग ने कई क्षेत्रों में मिट्टी की सेहत को खराब किया है और उपज में वृद्धि को सीमित कर दिया है। एनबीएस योजना द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों (माइक्रोन्यूट्रिएंट्स) के उपयोग को बढ़ावा देकर मृदा क्षरण और पोषक तत्वों के असंतुलन की समस्या का समाधान करती है।
उर्वरक उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि
सरकार की एनबीएस योजना के सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। देश में खाद्यान्न उत्पादकता, जो 2010-11 में 1,930 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर थी, वह 2024-25 में बढ़कर 2,578 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो गई है। यह वृद्धि मोटे तौर पर एनबीएस योजना के विस्तार की अवधि के साथ मेल खाती है। घरेलू उत्पादन के मोर्चे पर भी भारत ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2014 के बाद से घरेलू फॉस्फेटिक और पोटाश उर्वरक उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे आयात पर निर्भरता कम हुई है।
वैश्विक महंगाई से मिलेगी राहत?
सरकार के इस निर्णय से रबी सीजन में न केवल किसानों को वैश्विक महंगाई से राहत देगी, बल्कि यह भारतीय कृषि को वैज्ञानिक और संतुलित खेती को भी प्रोत्साहन मिलेगा। इससे पहले केंद्र सरकार ने 2022-23 और 2024-25 के बीच एनबीएस सब्सिडी पर 2.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए हैं।











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