
शामली में कोरे कागज और अटेंडेंस शीट के सहारे लाखों के भुगतान की जांच के आदेश
सहारनपुर की 96, मुजफ्फरनगर की 26 और बुलंदशहर की 188 ऑडिट रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड
लोकपथ लाइव, शामली/मुजफ्फरनगर। ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के नाम पर खर्च होने वाली सरकारी धनराशि का हिसाब-किताब ऑनलाइन सार्वजनिक करने और वित्तीय अनियमितताओं पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से शुरू की गई डिजिटल व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े होने लगे हैं। शामली जिले की ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के भुगतान के समर्थन में ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर वास्तविक बिल-बाउचर के स्थान पर कोरे कागज, धुंधले दस्तावेज और मजदूरों की अटेंडेंस शीट अपलोड किए जाने का मामला सामने आया है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के 41 जिलों की पंचायत ऑडिट रिपोर्ट पोर्टल पर शून्य प्रदर्शित होने की जानकारी ने वित्तीय जवाबदेही और ऑनलाइन निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर बहस छेड़ दी है।


पंचायतों में नाली निर्माण, सीसी सड़क, खड़ंजा, सफाई और हैंडपंप रिबोर जैसे कार्यों पर लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं। नियमानुसार इन कार्यों के खर्च का सत्यापन संबंधित अभिलेखों के आधार पर किया जाना चाहिए। ऐसे में यदि भुगतान के समर्थन में आवश्यक दस्तावेज स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हैं, तो खर्च की वास्तविकता और उसकी वित्तीय जांच को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, पोर्टल पर दस्तावेजों का अस्पष्ट या अनुपलब्ध होना अपने आप में भ्रष्टाचार का अंतिम प्रमाण नहीं है। इसके लिए मूल अभिलेखों, भुगतान विवरण और कार्यों की भौतिक स्थिति की जांच आवश्यक है।

युसुफपुर में बिल की जगह अटेंडेंस शीट और कोरा कागज
शामली जिले की ग्राम पंचायत युसुफपुर में दर्ज विकास कार्यों के दस्तावेजों की पड़ताल के दौरान गंभीर सवाल सामने आए हैं। यहां नाली की दीवार के निर्माण पर 72,259 रुपये खर्च दर्शाए गए हैं, लेकिन भुगतान के समर्थन में बिल-बाउचर के स्थान पर मजदूरों की उपस्थिति पत्रक यानी अटेंडेंस शीट अपलोड मिली। इसी ग्राम पंचायत में दरबार सिंह के डेरे से कश्मीर सिंह के मकान तक खड़ंजा निर्माण के लिए 77,885 रुपये खर्च दर्ज किए गए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस कार्य के बिल-बाउचर के स्थान पर पोर्टल पर कोरा कागज अपलोड मिला। इन दोनों मामलों में यह स्पष्ट होना जरूरी है कि भुगतान किस सामग्री, श्रम और निर्माण कार्य के लिए किया गया तथा संबंधित अधिकारियों ने अभिलेखों का सत्यापन किस आधार पर किया।
बिडौली में धुंधले बिल, काबड़ौत में खर्च के दस्तावेजों पर सवाल
ग्राम पंचायत बिडौली में तालाब के पास सीसी सड़क निर्माण पर 1.21 लाख रुपये से अधिक का खर्च दर्ज है। लेकिन पोर्टल पर अपलोड किए गए बिल कथित तौर पर इतने धुंधले हैं कि उनमें दर्ज विवरण पढ़ना मुश्किल है। इसी गांव में सफाई कार्य के नाम पर 24,225 रुपये का भुगतान दर्ज किया गया है। इस मामले में भी स्पष्ट बिलों के बजाय धुंधली पर्चियों और मजदूरों की उपस्थिति संबंधी दस्तावेजों का उल्लेख किया गया है। उधर, ग्राम पंचायत काबड़ौत में मोहर सिंह के मकान से विनोद के मकान तक सीसी सड़क निर्माण और हैंडपंप रिबोर के कार्यों पर कुल मिलाकर 1.22 लाख रुपये से अधिक की धनराशि खर्च दर्शाई गई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, यहां भी अपलोड दस्तावेज स्पष्ट नहीं हैं। ऐसे में संबंधित कार्यों की लागत, भुगतान पाने वाले व्यक्ति या फर्म, सामग्री की खरीद और काम पूरा होने के प्रमाणों की जांच महत्वपूर्ण हो जाती है। इन उदाहरणों के बाद सवाल यह है कि यदि ऑनलाइन अभिलेख ही खर्च का सत्यापन करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, तो भुगतान से पहले और बाद में दस्तावेजों की जांच करने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी कैसे निर्धारित की जाएगी।
जिलाधिकारी ने दिए जांच के निर्देश, डीपीआरओ से जवाब-तलबी
शामली के जिलाधिकारी आलोक यादव ने पोर्टल पर कोरे और धुंधले दस्तावेज अपलोड किए जाने के मामले को गंभीर बताते हुए विस्तृत जांच कराने की बात कही है। इस संबंध में जिला पंचायत राज अधिकारी से भी स्पष्टीकरण और जवाब-तलबी किए जाने की जानकारी सामने आई है। जिला पंचायत राज अधिकारी संदीप अग्रवाल के अनुसार, विकास कार्यों के नाम पर अस्पष्ट अथवा कोरे बिल अपलोड किए जाने का मामला गंभीर है। पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। जांच में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही अथवा अनियमितता सामने आने पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। अब जांच में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित ग्राम पंचायतों में वास्तव में कार्य कराए गए या नहीं, भुगतान के लिए कौन से मूल दस्तावेज इस्तेमाल किए गए, अभिलेखों को पोर्टल पर अपलोड करने की जिम्मेदारी किसकी थी और सत्यापन के दौरान इन कमियों पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया।
——————-
यूपी में 41 जिलों में ऑडिट रिपोर्ट शून्य होने का दावा
शामली में बिल-बाउचर की स्थिति पर सवाल उठने के बीच ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर उत्तर प्रदेश के 41 जिलों की ऑडिट रिपोर्ट अपलोड संख्या शून्य दिखाई देने की जानकारी भी सामने आई है। इनमें पश्चिमी उत्तर प्रदेश के शामली, बागपत, बिजनौर, मेरठ और मुरादाबाद समेत कई जिले शामिल बताए गए हैं। इसके विपरीत, उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सहारनपुर जिले की 96, मुजफ्फरनगर जिले की 26 और बुलंदशहर जिले की 188 ऑडिट रिपोर्ट पोर्टल पर अपलोड की गई हैं। इन आंकड़ों से जिलों के बीच ऑनलाइन रिपोर्टिंग की स्थिति में अंतर दिखाई देता है। हालांकि, पोर्टल पर ऑडिट रिपोर्ट की संख्या शून्य दिखने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि संबंधित जिले की किसी भी ग्राम पंचायत का ऑडिट नहीं हुआ। इसके पीछे रिपोर्ट तैयार होने में देरी, पोर्टल पर अपलोड न होना, डेटा अद्यतन की स्थिति या संबंधित वित्तीय वर्ष के अभिलेखों की उपलब्धता जैसे कारण भी हो सकते हैं। इसलिए वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने के लिए संबंधित वित्तीय वर्ष, कुल ग्राम पंचायतों की संख्या, निर्धारित ऑडिट, पूर्ण ऑडिट और पोर्टल पर अपलोड रिपोर्टों का तुलनात्मक विवरण आवश्यक है।
क्या है ई-ग्राम स्वराज और ऑडिट ऑनलाइन व्यवस्था?
ई-ग्राम स्वराज भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय की डिजिटल पहल है। इसका उद्देश्य ग्राम पंचायतों की योजना, बजट, विकास कार्यों, लेखांकन और भुगतान से संबंधित जानकारी को डिजिटल माध्यम से व्यवस्थित करना तथा पारदर्शिता बढ़ाना है। इससे पंचायतों के कामकाज की निगरानी करने वाले अधिकारियों और आम नागरिकों को उपयोगी जानकारी उपलब्ध हो सकती है। पंचायतों के वित्तीय लेखों की जांच के लिए ऑडिट की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। ऑडिट के माध्यम से आय-व्यय का परीक्षण, अभिलेखों का मिलान, वित्तीय अनियमितताओं की पहचान और आवश्यक सुधारात्मक कार्रवाई की जा सकती है। ऑडिट में सामने आने वाली आपत्तियों का निस्तारण और अनुपालन सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है। इस व्यवस्था की वास्तविक उपयोगिता तभी सुनिश्चित हो सकती है, जब पोर्टल पर दर्ज आंकड़े अद्यतन हों, दस्तावेज स्पष्ट और सत्यापन योग्य हों तथा भुगतान से संबंधित मूल अभिलेख नियमानुसार सुरक्षित रखे जाएं।
विकास कार्यों की गुणवत्ता और भुगतान का हो मिलान
ग्राम पंचायतों में सरकारी धन से बनने वाली सड़कें, नालियां, खड़ंजे, पेयजल सुविधाएं और सफाई व्यवस्था सीधे ग्रामीणों के जीवन से जुड़ी हैं। इसलिए वित्तीय रिकॉर्ड की जांच केवल कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। संबंधित निर्माण कार्यों की मौके पर स्थिति, स्वीकृत लागत, माप पुस्तिका, सामग्री खरीद के बिल, भुगतान विवरण और कार्य पूर्णता प्रमाणपत्र का मिलान भी जरूरी है। यदि किसी काम के लिए भुगतान किया गया है, तो यह सुनिश्चित होना चाहिए कि उसके अनुरूप काम वास्तव में हुआ हो और भुगतान से संबंधित अभिलेख नियमों के अनुरूप हों। इसी तरह, जहां दस्तावेज अस्पष्ट हैं, वहां मूल बिलों और संबंधित रजिस्टरों की जांच करके स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए।
जवाबदेही तय करने के लिए जरूरी हैं चार कदम
पहला, शामली की संबंधित ग्राम पंचायतों में दर्ज भुगतानों और अपलोड किए गए दस्तावेजों की मूल अभिलेखों से जांच कराई जाए। दूसरा, स्वीकृत बजट, भुगतान, माप पुस्तिका और मौके पर कराए गए कार्यों का मिलान किया जाए। तीसरा, उत्तर प्रदेश के जिन 41 जिलों में ऑडिट रिपोर्ट शून्य दिखाई दे रही है, वहां वित्तीय वर्षवार ऑडिट और अपलोड की वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाए। चौथा, जहां रिपोर्टिंग में देरी, दस्तावेजों की कमी या वित्तीय अनियमितता सामने आए, वहां जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
पारदर्शिता का दावा तभी सार्थक, जब उपलब्ध हो पूरा हिसाब
ई-ग्राम स्वराज जैसी डिजिटल व्यवस्था से ग्रामीणों को अपने गांव के विकास कार्यों और सरकारी खर्च की जानकारी हासिल करने का अवसर मिलता है। लेकिन इसका लाभ तभी मिलेगा, जब पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी पूरी, स्पष्ट और भरोसेमंद हो। शामली में सामने आए दस्तावेजों से जुड़े सवाल और 41 जिलों की ऑडिट रिपोर्ट शून्य होने के आंकड़े प्रशासनिक स्तर पर गंभीर समीक्षा की जरूरत दर्शाते हैं। अब निगाहें शामली में प्रस्तावित जांच और प्रदेश के संबंधित जिलों में ऑडिट रिपोर्ट की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करने पर टिकी हैं। जांच के निष्कर्ष, मूल अभिलेखों का सत्यापन और लंबित रिपोर्टों को अद्यतन करने की कार्रवाई ही यह बताएगी कि कमियां केवल डिजिटल रिकॉर्ड तक सीमित हैं या कहीं वित्तीय जवाबदेही से जुड़ी गंभीर अनियमितताएं भी मौजूद हैं।












Total views : 444246