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क्या NEET में अलग मेरिट से बढ़ सकता है सरकारी शिक्षा का आकर्षण!

भारत में शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक समानता का सबसे प्रभावी साधन भी है। देश में लाखों विद्यार्थी सरकारी विद्यालयों में अध्ययन करते हैं, लेकिन उच्च शिक्षा, विशेषकर चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश के समय निजी और सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों के बीच अवसरों की असमानता को लेकर लगातार बहस होती रही है। ऐसे में यह विचार गंभीरता से विचारणीय है कि क्या सरकारी विद्यालयों में कक्षा 1 से 12वीं तक लगातार अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए मेडिकल प्रवेश में एक अलग मेरिट व्यवस्था विकसित की जा सकती है?
वर्तमान में NEET-UG देशभर में MBBS, BDS तथा अन्य संबंधित चिकित्सा पाठ्यक्रमों में प्रवेश का प्रमुख राष्ट्रीय स्तर का माध्यम है। इसमें विद्यार्थियों की रैंक मुख्यतः NEET में प्राप्त अंकों के आधार पर निर्धारित होती है। यह व्यवस्था समान परीक्षा के माध्यम से समान अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास करती है। लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या सभी विद्यार्थियों की सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक परिस्थितियां वास्तव में समान होती हैं?
सरकारी विद्यालय के विद्यार्थी की अलग चुनौतियां
एक सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाला विद्यार्थी अक्सर सीमित संसाधनों के बीच अपनी पढ़ाई करता है। दूसरी ओर, अनेक निजी विद्यालयों में विद्यार्थियों को बेहतर डिजिटल संसाधन, अंग्रेजी माध्यम, अतिरिक्त कक्षाएं, नियमित टेस्ट सीरीज और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए विशेष मार्गदर्शन जैसी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं।
यहां यह कहना उचित नहीं होगा कि निजी विद्यालयों में पढ़ने वाला प्रत्येक विद्यार्थी आर्थिक रूप से समृद्ध होता है अथवा सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाला प्रत्येक विद्यार्थी वंचित वर्ग से आता है। वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। फिर भी विद्यालयी शिक्षा की गुणवत्ता, संसाधनों की उपलब्धता और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के अवसरों में अंतर एक महत्वपूर्ण नीति-विषय है।
एक वैकल्पिक मॉडल पर विचार
एक संभावित नीति मॉडल यह हो सकता है कि जो विद्यार्थी प्रारंभिक शिक्षा से लेकर कक्षा 12 तक लगातार सरकारी विद्यालयों में अध्ययन करते हैं , उनके लिए चिकित्सा प्रवेश में
एक पृथक सरकारी विद्यालय मेरिट श्रेणी बनाई जाए।
उदाहरण के लिए, किसी विद्यार्थी ने प्राथमिक स्तर से इंटरमीडिएट तक सरकारी विद्यालय में शिक्षा प्राप्त की और NEET में निर्धारित न्यूनतम पात्रता तथा आवश्यक प्रतिस्पर्धात्मक स्तर हासिल किया, तो ऐसे विद्यार्थियों की आपस में अलग मेरिट बनाई जा सकती है।
इसका उद्देश्य NEET की गुणवत्ता या राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन विद्यार्थियों को एक अतिरिक्त अवसर देना होगा जिन्होंने अपनी पूरी स्कूली शिक्षा सरकारी शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से पूरी की है।
क्या निजी विद्यालय के विद्यार्थियों के साथ भेदभाव होगा?
यह इस नीति की सबसे महत्वपूर्ण चुनौती होगी। केवल सरकारी विद्यालय में पढ़ने के आधार पर किसी विद्यार्थी को स्वतः मेडिकल सीट देना उचित नहीं होगा। चिकित्सा शिक्षा में प्रवेश के लिए योग्यता और प्रतिस्पर्धा का स्तर बनाए रखना आवश्यक है।
इसलिए यदि कभी ऐसी व्यवस्था पर विचार किया जाए तो NEET की न्यूनतम पात्रता और निर्धारित राष्ट्रीय मानकों को बनाए रखते हुए सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए सीमित संख्या में अतिरिक्त सीटें अथवा आरक्षण/विशेष कोटा जैसी व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
साथ ही, निजी विद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखना भी आवश्यक होगा। ऐसी किसी व्यवस्था की वैधानिकता और व्यवहार्यता का परीक्षण विशेषज्ञों तथा विधि विशेषज्ञों द्वारा किया जाना चाहिए।
सरकारी विद्यालयों में नामांकन बढ़ाने का प्रभाव
इस प्रयोग का सबसे बड़ा संभावित लाभ यह हो सकता है कि अभिभावकों का सरकारी विद्यालयों के प्रति विश्वास बढ़े।
आज अनेक अभिभावक अपने बच्चों को निजी विद्यालयों में इसलिए भेजते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि निजी विद्यालयों में पढ़ने से उच्च शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं में बेहतर अवसर मिलेंगे। यदि सरकारी विद्यालय से पढ़कर भी किसी विद्यार्थी के लिए डॉक्टर बनने का स्पष्ट और मजबूत मार्ग दिखाई देने लगे, तो सरकारी विद्यालयों की ओर अभिभावकों का रुझान बढ़ सकता है।
इससे केवल नामांकन ही नहीं बढ़ेगा, बल्कि सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की प्रतिस्पर्धा भी पैदा हो सकती है।
लेकिन केवल मेरिट अलग करना पर्याप्त नहीं
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना आवश्यक है। यदि सरकारी विद्यालयों से MBBS तक पहुंच का रास्ता मजबूत करना है तो केवल अलग मेरिट बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
सरकारी विद्यालयों में
गणित एवं विज्ञान की मजबूत नींव,
प्रयोगशालाओं की बेहतर व्यवस्था,
स्मार्ट क्लास एवं डिजिटल संसाधन,
अंग्रेजी और हिंदी दोनों माध्यमों में गुणवत्तापूर्ण अध्ययन सामग्री,
NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए निःशुल्क कोचिंग,
नियमित टेस्ट एवं करियर काउंसलिंग,
विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की उपलब्धता
जैसी व्यवस्थाओं को भी मजबूत करना होगा।
विशेष रूप से कक्षा 9 से 12 तक विज्ञान वर्ग के विद्यार्थियों के लिए सरकारी स्तर पर NEET तैयारी की निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण व्यवस्था इस दिशा में बड़ा परिवर्तन ला सकती है।
सरकारी विद्यालय से डॉक्टर बनने की प्रेरणा
कल्पना कीजिए कि किसी ग्रामीण क्षेत्र का विद्यार्थी सरकारी प्राथमिक विद्यालय से पढ़ना शुरू करता है, सरकारी माध्यमिक विद्यालय से आगे बढ़ता है और इंटरमीडिएट तक सरकारी विद्यालय में अध्ययन करता है। यदि उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, प्रयोगशाला, डिजिटल संसाधन और प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का अवसर मिले तथा वह NEET में सफलता प्राप्त करके सरकारी मेडिकल कॉलेज में MBBS में प्रवेश ले सके, तो वह केवल स्वयं सफल नहीं होगा, बल्कि अपने गांव और क्षेत्र के हजारों बच्चों के लिए प्रेरणा बन सकता है।
ऐसे उदाहरण सरकारी शिक्षा व्यवस्था में विश्वास पैदा करने के लिए किसी भी विज्ञापन से अधिक प्रभावी हो सकते हैं।
यह प्रयोग कैसे किया जा सकता है?
इस विचार को तुरंत पूरे देश में लागू करने के बजाय किसी एक राज्य या कुछ जिलों में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए पांच वर्षों तक यह देखा जा सकता है कि सरकारी विद्यालयों में कक्षा 1 से 12 तक लगातार अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिए विशेष चिकित्सा शिक्षा अवसर उपलब्ध कराने से—
सरकारी विद्यालयों में नामांकन कितना बढ़ा,
विद्यालय छोड़ने की दर कितनी कम हुई,
NEET में सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों की सफलता कितनी बढ़ी,
और अभिभावकों के सरकारी शिक्षा व्यवस्था के प्रति विश्वास में कितना परिवर्तन आया।
इन आंकड़ों के आधार पर आगे की नीति बनाई जा सकती है।
भारत को ऐसी शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें विद्यार्थी का भविष्य केवल इस बात से तय न हो कि उसके माता-पिता उसे किस प्रकार के विद्यालय में पढ़ाने में सक्षम हैं, बल्कि उसकी प्रतिभा, मेहनत और क्षमता को पर्याप्त अवसर मिले।
NEET में सरकारी विद्यालयों से लगातार शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के लिए अलग मेरिट अथवा विशेष अवसर की अवधारणा इसी दिशा में एक नीति-प्रयोग हो सकती है। हालांकि इसे लागू करने से पहले संवैधानिक प्रावधानों, समानता के अधिकार, NEET की राष्ट्रीय प्रकृति और चिकित्सा शिक्षा के गुणवत्ता मानकों का गंभीर अध्ययन आवश्यक होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी विद्यालयों को केवल गरीब या कमजोर वर्ग के बच्चों की शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, प्रशासनिक अधिकारी और देश के भविष्य के नेतृत्वकर्ता तैयार करने वाले उत्कृष्ट संस्थान बनाया जाए।
यदि सरकारी विद्यालय में पढ़ने वाला बच्चा यह विश्वास लेकर स्कूल जाए कि मैं भी डॉक्टर बन सकता हूं, मैं भी देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में सफलता प्राप्त कर सकता हूँ , तो यही विश्वास भारतीय सरकारी शिक्षा व्यवस्था में एक बड़े परिवर्तन की शुरुआत बन सकता है।
सरकारी विद्यालय मजबूत होंगे, तो शिक्षा में समान अवसर मजबूत होंगे; और समान अवसर मजबूत होंगे, तो देश का भविष्य और अधिक समावेशी और सशक्त होगा।
डा. रणवीर सिंह, प्रधानाचार्य, राजकीय इंटर कालेज कम्हेड़ा।
यह इनके अपने विचार है।

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