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केंद्रीय हिंदी निदेशालय की योजना में डॉ सुशील उपाध्याय सहित देशभर से 8 विद्वानों का चयन

लोकपथ लाइव, देहरादून। केंद्रीय हिंदी निदेशालय की विस्तार कार्यक्रम योजना के अंतर्गत देशभर से चयनित आठ हिंदी विद्वानों में उत्तराखंड के डॉ. सुशील उपाध्याय को भी शामिल किया गया है। हिंदी भाषी क्षेत्रों से चयनित चार प्राध्यापकों में स्थान बनाने वाले डॉ. सुशील उपाध्याय उत्तराखंड के एकमात्र प्रतिनिधि हैं। केंद्रीय हिंदी निदेशालय के निदेशक प्रो. हितेंद्र कुमार मिश्र की ओर से जारी पत्र के माध्यम से उनके चयन की आधिकारिक सूचना दी गई।

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विस्तार कार्यक्रम योजना का उद्देश्य हिंदी और गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों के बीच भाषा एवं साहित्य के माध्यम से संवाद को मजबूत करना है। इसके तहत हिंदीतर भाषी क्षेत्रों के विद्यार्थियों की अध्ययन यात्राएं, हिंदी नवलेखक शिविर, राष्ट्रीय संगोष्ठियां तथा व्याख्यानमालाओं का आयोजन किया जाता है। निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ. दीपक पांडेय ने बताया कि यह योजना राष्ट्रीय एकता को भाषा के माध्यम से सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

चयन के बाद डॉ. सुशील उपाध्याय महाराष्ट्र के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में हिंदी के प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों से संवाद करेंगे। वे हिंदी भाषा, साहित्य और हिंदी परिवेश से विद्यार्थियों को जोड़ने के साथ-साथ प्रशासन, शिक्षा और व्यवसाय में हिंदी की उपयोगिता, भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद की आवश्यकता, समकालीन मीडिया, न्यू मीडिया और सोशल मीडिया में हिंदी की बदलती भूमिका, स्त्री विमर्श और दलित साहित्य जैसे विषयों पर व्याख्यान देंगे।

इसके अलावा व्याख्यानमाला के दौरान हिंदी में सृजनात्मक लेखन, सिनेमा और समाज के संबंध, नई शिक्षा नीति के संदर्भ में भारत की भाषाई विविधता, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और हिंदी भाषा, हिंदी के माध्यम से करियर निर्माण की संभावनाएं तथा राजभाषा हिंदी के विभिन्न आयामों पर भी विस्तार से चर्चा होगी।

योजना के तहत गैर हिंदी भाषी क्षेत्रों और हिंदी भाषी राज्यों के बीच शैक्षणिक आदान-प्रदान को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी क्रम में केरल की हिंदी विदुषी प्रो. सिंधु टी.आई. आगामी सितंबर में उत्तराखंड के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों, शोधार्थियों तथा प्राध्यापकों के साथ संवाद करेंगी। इस पहल को हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार और राष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक सहयोग को नई दिशा देने वाला कदम माना जा रहा है।

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