
इस मनमाने आदेश को कोर्ट में चुनौती देगा राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद
लोकपथ लाइव, लखनऊ। पिछले सप्ताह शुक्रवार को प्रदेशभर में बिजली उपभोक्ताओं को करीब 47 लाख बिजली उपभोक्ताओं के लिए एक बेहद झटका देने वाली खबर उस समय सामने आई है, जब एक झटके में बिजली कंपनियों ने नियमों को ताक पर रखते हुए बिना किसी पूर्व सूचना, नोटिस या उपभोक्ताओं की सहमति के उनके कनेक्शन का स्वीकृत लोड बढ़ा दिया है। मोबाइली संदेश के जरिए इस मनमाने कदम को लेकर अब पूरे प्रदेश में विवाद गहरा गया है। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने इसे नियामक आयोग के नियमों और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए राज्य सरकार से मामले में तुरंत दखल देने और इस पर रोक लगाने की मांग की है। उपभोक्ता परिषद ने चेतावनी दी है कि अगर सरकार ने इस अवैध लोड बढ़ोतरी को तुरंत वापस नहीं लिया, तो वे उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए नियामक आयोग और अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे।


कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में उपभोक्ता परिषद
राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने मामले का खुलासा करते हुए बताया कि जिन 47 लाख उपभोक्ताओं का लोड बढ़ाया गया है, उनमें से लगभग 50 फीसदी ऐसे हैं जिनके घरों में स्मार्ट मीटर लगे हुए हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें करीब 25 प्रतिशत (लगभग 11.75 लाख) ऐसे गरीब उपभोक्ता हैं, जो अब तक बेहद कम उपभोग के कारण सरकार की रियायती दर (लाइफ लाइन/सब्सिडी श्रेणी) का लाभ ले रहे थे। लोड बढ़ने के कारण ये सीधे सब्सिडी के दायरे से बाहर हो जाएंगे। दरअसल बिना बताए लोड बढ़ा दिए जाने से उपभोक्ताओं पर दोहरी मार पड़ रही है। लोड बढ़ते ही उपभोक्ताओं का फिक्स्ड चार्ज (स्थायी शुल्क) बढ़ जाता है, जिससे हर महीने आने वाला बिजली का बिल बिना वजह महंगा हो जाएगा। उपभोक्ताओं का आरोप है कि बिजली विभाग अपनी कमियों और लाइन लॉस को छुपाने के लिए आम जनता की जेब पर डाका डाल रहा है। परिषद के आकलन के अनुसार, बिजली कंपनियों के इस गुपचुप फैसले का सबसे बुरा असर समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर पड़ने वाला है। इसके तहत ग्रामीण बीपीएल परिवार के मासिक बिल में औसतन ₹165 प्रति माह की बढ़ोतरी हो जाएगी। जबकि शहरी गरीब उपभोक्ताइाओं के बजट पर हर महीने लगभग ₹435 प्रति माह का अतिरिक्त फिक्स चार्ज और बढ़ा हुआ टैरिफ भार आएगा।

तीन महीने के आकलन का है नियम
विद्युत उपभोक्ता नियमों के मुताबिक, यदि किसी उपभोक्ता की बिजली की डिमांड (खपत) लगातार तीन महीने तक उनके स्वीकृत लोड से अधिक पाई जाती है, तभी विभाग पत्राचार या नोटिस के जरिए लोड बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है। लेकिन वर्तमान में विभाग इस नियम को पूरी तरह दरकिनार कर रहा है। भीषण गर्मी के कारण यदि किसी उपभोक्ता की डिमांड सिर्फ एक या दो महीने के लिए भी स्वीकृत लोड से ऊपर चली गई, तो विभाग बिना किसी जांच या नोटिस के सीधे लोड बढ़ाए दे रहा है।
टैरिफ आदेश का हवाला नियमों से दूर
अवधेश कुमार वर्मा ने उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) के टैरिफ आदेश का हवाला देते हुए कहा कि नियम बेहद स्पष्ट हैं। नियम के मुताबिक, यदि कोई उपभोक्ता लगातार तीन महीने तक अपने स्वीकृत लोड से अधिक बिजली का इस्तेमाल करता है, तो बिजली विभाग को पहले उसे लिखित नोटिस देकर स्पष्टीकरण का मौका देना अनिवार्य है। उपभोक्ता की बात सुनने के बाद ही लोड बढ़ाने की वैधानिक प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। वर्तमान मामले में इस अनिवार्य प्रक्रिया को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया है।
विपक्ष ने बताया गरीबों की जेब पर डाका
इस मुद्दे पर अब सियासत भी गरमा गई है। आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रदेश प्रवक्ता वंशराज दुबे ने भाजपा की योगी सरकार पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि लखनऊ समेत पूरे सूबे में धड़ल्ले से बिना किसी आवेदन के उपभोक्ताओं का लोड बढ़ाया जा रहा है। दुबे ने कहा कि यह सरकार बिजली व्यवस्था के बुनियादी ढांचे को सुधारने में पूरी तरह नाकाम रही है और अपनी कमियों को छिपाने के लिए अब गरीब जनता की ‘लाइफ लाइन’ श्रेणी की सब्सिडी को खत्म कर उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ लाद रही है। आम आदमी पार्टी इस जनविरोधी कदम का पुरजोर विरोध करती है।











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