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मानवीय कर्तव्य समझें पीड़ितों को आश्रय देना: डा. रमेश ठाकुर

_ लेखक वरिष्ठ पत्रकार डा. रमेश ठाकुर है।

20 जून को समूचे संसार में ‘विश्व शरणार्थी दिवस मनाया जा रहा है जो संयुक्त राष्टृ द्वारा विश्वभर के अनगिनत लोगों को सम्मानित करने के लिए नामित एक अंतर्राष्टृीय दिवस है। ऐसे अभागे लोग जिन्हें मजबूरियों, संघर्ष, हिंसा, उत्पीड़ित होकर ना चाहते भी अपने घरों को छोड़ना पड़ा हो। यह दिवस शरणार्थियों की हिम्मत, शक्ति, साहस, संकल्प की सराहना करता है, उन्हें धैर्य रखने का संबल प्रदान करता है। शरणार्थियों के रूप में विश्व की बड़ी आबादी आज भी बे-मुल्क है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 4 दिसंबर, 2000 को ‘विश्व शरणार्थी दिवस’ घोषित किया गया था और अगले ही वर्ष यानी 2001 से, दिवस को वार्षिक कार्यक्रम के रूप में मनाने की पहचान मिली। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1951 ‘कन्वेंशन रिफ्यूजी स्टेटस’ की 50वीं वर्षगांठ के रूप में इस दिवस को चिह्नित किया था। हालांकि, कुछेक मुल्कों ये दिवस अलग-अलग तिथियों में मनाया जाता है।

शरणार्थी दिवस हमें बेघर लोगों की सुरक्षा करने, उनकी आर्थिक दुर्दशा सुधारने और समाज के साथ तालमेल बिठाने की दिशा में वकालत के लिए प्रेरित करता है। भारत में इस समय विभिन्न देशों के करीब 2 से 3 लाख के बीच निर्वासित लोग हैं।  शरणार्थियों के अधिकृत आंकड़े देखें, तो भारत में वर्ष-2021 में शरणार्थियों की संख्या 2,12,413 थी। 2022 में 8.72 फीसदी की बढ़ौतरी होकर संख्या 2,42,835 तक पहुंची। जबकि, सन् 2020 में 195,373 ही थी। सीरिया, अफगानिस्तान, दक्षिण सूडान, म्यांमार व सोमालिया ये पांच ऐसे मुल्क हैं, जिनमें विश्व की तकरीबन दो तिहाई से अधिक शरणार्थियों की आबादी बसी हुई है। जरा सोचिए, अगर ये देश भी इन लोगों को खदेड़ दें? तो इनका क्या होगा। भारत अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान जैसे एकाध और एशियाई देशों के शरणार्थियों डेरा डाले हुए हैं। ये सभी हिंदू हैं जिन्हें उपरोक्त देशों ने धर्म के आधार पर पीड़ित किया, जिसके चलते इन्होंने हिंदुस्तान की शरण ली। हालांकि इन्हें नागरिकता देने के लिए केंद्र सरकार ने सीएए कानून लागू किया है। लेकिन सवाल उठता है, भारत ने तो शरणार्थियों का समाधान निकाल लिया पर, अन्य देश इस समस्या को सुलझाने के लिए कब पहल करेंगे? 2026 की थीम है ‘शरणार्थियों के साथ एकजुटता’ जबकि, 2025 की थीम ‘निर्वासितों के स्वास्थ्य की देखरेख करना’।

गौतरलब है भारत में तिब्बत, भूटान, नेपाल व मंम्यार के शरणार्थी भी पनाह लिए हुए हैं। ये आधुनिक समय की विकट समस्याओं में एक है। शरणार्थियों के संबंध में हमें समझना होगा, आखिर ये होते कौन हैं और इनसे ये शब्द क्यों जुड़ा? दरअसल, शरणार्थी वह पीड़ित जमात हैं जिन्हें युद्ध या हिंसा के कारण अपना घर-संसार न चाहते हुए भी त्यागना पड़ा। उन्हें हमेशा जाति, धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीतिक या किसी विशेष सामाजिक समूहों से पीड़ित होना पड़ा हो। समय बदला है और व्यवस्थाएं भी बदली हैं। हुकूमतें भी सख्त हैं, कानन-व्यवस्थाएं भी दुरूस्त हैं, के बावजूद भी शरणार्थियों की समस्याएं जस की तस बनी है। एशिया कुछ ज्यादा ही इस परेशान से घिरा है। शायद कोई ऐसा एशियाई मुल्क नहीं, जहां विगत वर्षों से म्यांमार के रोहिंग्या न पहुंचे हों।दिक्कत सबसे बड़ी एक ये है अपना देश छोड़ने के बाद शरणार्थी फिर आसानी से अपने घर वापस नहीं लौट पाते? फिर उन्हें ताउम्र दर दर ही भटकना पड़ता है क्योंकि आज कोई भी मुल्क ऐसे लोगों को पनाह देने को राजी नहीं हैं। एक वक्त था, जब शरणार्थी सिर्फ हिंसा, दंगा या युद्ध के चलते ही अपना देश छोड़ते थे पर, अब जातीय और धार्मिक कारणों के चलते भी लोग घर छोड़ने है। एकाध उदाहरण हमारे सामने बिल्कुल ताजे हैं। आदिवासी लोग अपने ही देश में शरणार्थियों जैसा जीवन जीने को विवश हैं। लाखों की आबादी आज भी वनों में रहती है। शरणार्थी शब्द ‘शरण’ या पनाह से जुड़ता है जिसका अर्थ है पीछा, खतरा या कठिनाई है। जिनेवा कन्वेंशन के दौरान ही शरणार्थियों की वैश्विक परिभाषा को सरकारी मान्यता दी गई थी।

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