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मुजफ्फरनगर में दो बार डीएम रहे पूर्व राज्य महासचिव डॉ. योगेन्द्र नारायण की आत्मकथा का विमोचन

 ‘सत्ता के राजनैतिक खेल’ पुस्तक में खुले कई राज, 50 साल पुराना भावुक रिश्ता आया सामने
अंग्रेजों के बनाए ‘आपराधिक कबीले’ को शिक्षा देकर बनाया सरकारी अफसर
(ओ.पी. पाल)
लोकपथ लाइव, मुजफ्फरनगर/नोएडा: मुजफ्फरनगर में दो बार जिलाधिकारी (डीएम) रहकर जनता के दिलों में भगवान जैसा स्थान पाने वाले देश के बेहद वरिष्ठ पूर्व प्रशासनिक अधिकारी डॉ. योगेन्द्र नारायण ने अपने जीवन और प्रशासनिक अनुभवों को किताब की शक्ल देकर आत्मकथा लिख दी है। उनके 84वें जन्मदिन के अवसर पर उनकी आत्मकथा ‘समर्पित जन सेवा: सत्ता के राजनैतिक खेल’ का भव्य लोकार्पण किया गया। 1965 बैच के इस दिग्गज आईएएस अधिकारी ने अपनी पुस्तक में जन्म, शिक्षा, प्रशासनिक उतार-चढ़ाव और राजनीति के परदे के पीछे चलने वाले ‘नूरा-कुश्ती’ के खेलों का बेबाकी से जिक्र किया है। मुजफ्फरनगर का ऊन ब्लाक में एक ऐसे गांव की शक्ल बदलने वाले योगेन्द्र नारायण को बावरिया समुदाय के लोगो किसी भगवान से कम नहीं मानते, जिन्होंने उनके ऊपर लगे ‘जन्मजात अपराधी’ का ठप्पा हटाकर उन्हें शिक्षित बनाकर उन्हें सामाज की मुख्यधारा में जगह दिलाई। वहीं इस समुदाय के अनेक युवाओं को सरकारी नौकरी तक दिलाई।

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मुजफ्फरनगर में ‘भगवान’ बनकर उभरे डॉ. नारायण
वर्ष 1973 से 1976 तक जब डॉ. योगेन्द्र नारायण मुजफ्फरनगर के डीएम थे, तब उनके पास बावरिया समुदाय के कुछ लोग रोते हुए पहुंचे। ब्रिटिश हुकूमत ने एक दमनकारी अधिनियम के तहत इस समुदाय को ‘अपराधिक जनजाति’ घोषित कर दिया था। आजादी के बाद कानून तो बदल गया, लेकिन समाज और स्थानीय पुलिस की नजरों में उन पर लगा ‘जन्मजात अपराधी’ का ठप्पा नहीं हटा था। लोगों ने शिकायत की कि इलाके में कोई भी अपराध होने पर पुलिस उनके निर्दोष लोगों को उठाकर टॉर्चर करती है। उन्होंने इस समुदाय के लिए बसाए गांव को योगेन्द्रनगर नाम दिया। इस मुहिम में उस दौरान युवा डीएम ने मामले को गंभीरता से लेते हुए मुजफ्फरनगर के तत्कालीन ‘ऊन’ गांव में खुद जाकर डेरा डाल दिया। उन्होंने देखा कि गांव में न स्कूल था, न रोजगार। उन्होंने एसएसपी के साथ मिलकर पुलिसिया उत्पीड़न को रोका, गांव में पहला स्कूल बनवाया और बच्चों को कलम थमाई।

घरों में आज भी पूजी जाती है तस्वीर
साल 1974 में शुरू हुआ यह मानवीय रिश्ता आज 50 साल बाद भी उतना ही मजबूत है। डॉ. नारायण के प्रयासों का नतीजा है कि पिछले पांच दशकों में इस गांव के लगभग 130 बच्चे पुलिस, राजस्व और शिक्षक जैसी सरकारी नौकरियों में आ चुके हैं। आज भी ऊन गांव के कई घरों में डॉ. योगेन्द्र नारायण की तस्वीर लगी है और लोग उन्हें देवता की तरह पूजते हैं।

मेरठ में जन्म, प्रयागराज में गोल्ड मेडल और आईएएस र्में 10वीं रैंक
मेरठ में 26 जून 1942 को श्री कृपा नारायण माथुर के परिवार में जन्मे डॉ. योगेन्द्र नारायण की उच्च शिक्षा प्रयागराज (इलाहाबाद) में हुई। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एमए के दौरान स्वर्ण पदक जीता। इसके बाद उन्होंने ग्लासगो विश्वविद्यालय (यूके) से विकास अर्थशास्त्र में डिप्लोमा किया और आगे चलकर सूचना के अधिकार (आरटीआई) पर पीएचडी की। उन्होंने देश की दोनों सर्वोच्च सेवाओं आईएफएस में 9वीं रैंक और आईएएस में 10वीं रैंक हासिल की। लेकिन उन्होंने जनता के बीच सीधे काम करने के संकल्प के कारण आईएएस को चुनकर अपना करियर बनाया।

जीवन परिचय
पूरा नाम: योगेन्द्र नारायण (आईएएस अधिकारी)
जन्मतिथि: 26 जून, 1942 (मेरठ)
शिक्षा: बी.एससी., एम.ए., डिप्लोमा (डेवलपमेण्ट इकोनॉमिक्स), एम.फिल. और पीएच.डी.
विद्यालय: इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
सेवा कार्य काल: राज्य सभा महासचिव-1( सितंबर, 2002 से 14 सितंबर, 2007)
रक्षा सचिव, भारत: (20 अक्टूबर, 2000-30 जून, 2002)
मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश: 2 अप्रॅल, 1998-20 अक्टूबर, 2000

पुस्तकें: हिंदी व अंग्रेज़ी भाषा
-एबीसी ऑफ पब्लिक रिलेशन्स फॉर सिविल सर्वेण्ट्स
-सागा ऑफ सिविल सर्विसेज़
-क्लाउड्स एण्ड अदर पोयम्स
-राज्य सभा एट वर्क

आपातकाल का दौर: पीड़ितों को मरहम, नेताओं को जेल
मुजफ्फरनगर में पोस्टिंग के दौरान ही देश ने आपातकाल का दंश झेला। डॉ. नारायण ने अपनी आत्मकथा में बेहद बेबाकी से लिखा है कि किस तरह उन्होंने मुजफ्फरनगर के कुख्यात नसबंदी कांड के पीड़ितों के बीच जाकर उनका दर्द बांटा। वहीं दूसरी तरफ, कर्तव्य का पालन करते हुए आपातकाल के दौरान उन्होंने उन राजनेताओं को भी जेल भेजा, जिनके साथ वे कभी मिलकर काम कर चुके थे। जिले में तैनात दो बेहद ताकतवर और रसूखदार नेताओं के राजनीतिक चक्रव्यूह को उन्होंने कैसे ध्वस्त किया, इसकी पूरी इनसाइड स्टोरी किताब में दर्ज है।

मुख्य सचिव से रक्षा सचिव से राज्यसभा महासचित तक का सफर
मुजफ्फरनगर, अलीगढ़ और लखनऊ जैसे चुनौतीपूर्ण जिलों की कमान संभालने के बाद डॉ. योगेन्द्र नारायण उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव बने। इसके बाद वे केंद्र सरकार में भारत के रक्षा सचिव और राज्यसभा के महासचिव जैसे लोकतंत्र के शीर्ष पदों पर रहे। उन्हें नेशनल हाईवे अथॉरिटी (एनएचएआई) का संस्थापक अध्यक्ष बनने का भी गौरव प्राप्त है, जिसने देश में राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण की बुनियाद रखी। इसके अलावा उत्तर प्रदेश के विभाजन के समय उत्तराखंड को उसकी संपत्तियों का हिस्सा दिलाने की जटिल जिम्मेदारी भी उन्होंने निभाई। डा. योगेन्द्र नारायण को अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी सरकार में पहले रक्षा सचिव बनाया।

आत्मकथा में अनुभवों को किया साझा
किताब का एक बेहद रोचक हिस्सा एक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता के साथ उनके प्रशासनिक टकराव (नूरा-कुश्ती) को लेकर है, जिसने नौकरशाही और बॉलीवुड के रसूख के बीच की कशमकश को उजागर किया है। खेल और घुड़सवारी के शौकीन रहे डॉ. योगेन्द्र नारायण की यह आत्मकथा केवल एक आईएएस अधिकारी के संस्मरण नहीं हैं, बल्कि यह बीते छह दशकों के भारतीय प्रशासन, राजनीतिक दबावों के बीच ईमानदारी से काम करने की कला और देश के नीति-निर्माण की अंदरूनी गाथा है।

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