
फर्जी बिल बनाकर कराया भुगतान: ट्रक और ई-वे बिल नहीं पहुंचा तो खुला राज
लोकपथ लाइव, आगरा। गूगल सर्च इंजन पर दिखाई देने वाले संपर्क नंबर पर आंख मूंदकर भरोसा करना आगरा के एक कागज कारोबारी को भारी पड़ गया। साइबर ठगों ने मुजफ्फरनगर स्थित एक कथित पेपर मिल के मैनेजर और प्रबंध निदेशक बनकर कारोबारी से संपर्क किया। कागज की गुणवत्ता और कीमत को लेकर बातचीत की, भरोसा जीतने के लिए सैंपल भेजा और इसके बाद एडवांस तथा माल की कीमत के नाम पर कुल 6,85,811 रुपये अपने खातों में ट्रांसफर करा लिए। रकम मिलने के बाद आरोपियों ने मोबाइल फोन बंद कर दिए। पीड़ित की शिकायत पर आगरा साइबर क्राइम थाना पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस संबंधित बैंक खातों, मोबाइल नंबरों और लेनदेन से जुड़े डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर रही है।


गूगल पर कागज की तलाश, फर्जी फर्म से हुआ संपर्क
आगरा के यमुनोत्री कॉलोनी, कर्मयोगी, कमलानगर निवासी निलेश बंसल सेठ गली स्थित अपनी पैतृक फर्म नैमीचंद राकेश कुमार के माध्यम से कागज का थोक कारोबार करते हैं। कारोबार के लिए बड़े पैमाने पर कागज की जरूरत होने पर उन्होंने 15 सितंबर को गूगल पर कागज सप्लाई करने वाली मिलों और फर्मों की जानकारी तलाशनी शुरू की। इसी दौरान उन्हें मुजफ्फरनगर की आरामको पेपर्स प्राइवेट लिमिटेड के नाम से एक संपर्क नंबर मिला। नंबर पर बातचीत करने पर सामने वाले व्यक्ति ने खुद को फर्म का मैनेजर विकास बताया। इसके बाद कथित एमडी यामीन चौधरी से भी बातचीत कराई गई। आरोपियों ने कारोबारी से बेहद सामान्य कारोबारी प्रक्रिया के तहत बातचीत की। कागज की गुणवत्ता, मात्रा और कीमत को लेकर चर्चा हुई। विश्वास पैदा करने के लिए कागज का सैंपल भी भेजा गया। सैंपल मिलने के बाद कारोबारी को सौदा वास्तविक लगा और भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

पहले एडवांस, फिर पूरे भुगतान का जाल
पुलिस को दी गई शिकायत के अनुसार, 20 सितंबर को आरोपियों ने सौदा पक्का करने के नाम पर 1 लाख रुपये एडवांस के रूप में ट्रांसफर करा लिए। इसके बाद 25 सितंबर को कारोबारी को बताया गया कि 17,094 किलोग्राम कागज ट्रक में लोड किया जा चुका है।आरोपियों ने जीएसटी समेत कुल 6,85,811 रुपये का बिल भेजा। चूंकि 1 लाख रुपये पहले ही दिए जा चुके थे, इसलिए शेष 5,85,811 रुपये भी कारोबारी से ट्रांसफर करा लिए गए।
न ट्रक पहुंचा, न ई-वे बिल मिला
आरोपियों ने कारोबारी को बताया था कि कागज से लदा ट्रक रवाना हो गया है और जल्द माल पहुंच जाएगा। लेकिन 26 सितंबर तक न तो ट्रक पहुंचा और न ही कारोबारी को अपेक्षित ई-वे बिल अथवा ट्रक चालक की जानकारी मिली। शक होने पर निलेश बंसल ने आरोपियों से संपर्क करने का प्रयास किया। जिस नंबर पर लगातार बातचीत होती रही थी, वह अचानक बंद मिला। अन्य मोबाइल नंबरों पर भी संपर्क नहीं हो सका। इसके बाद कारोबारी को आशंका हुई कि वह साइबर ठगी का शिकार हो चुके हैं। बैंक अधिकारियों से संपर्क करने के बाद उन्होंने तत्काल साइबर हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई।
बैंक खातों और मोबाइल नंबरों की जांच में जुटी पुलिस
मामले की शिकायत मिलने के बाद आगरा साइबर क्राइम थाना पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस उन बैंक खातों की जानकारी जुटा रही है, जिनमें ठगी की रकम ट्रांसफर की गई। खातों में मौजूद रकम को फ्रीज कराने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। वहीं आरोपियों द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल नंबरों की कॉल डिटेल रिकॉर्ड, लोकेशन और अन्य तकनीकी जानकारी खंगाली जा रही है। पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि इन खातों और मोबाइल नंबरों का इस्तेमाल पहले भी किसी साइबर अपराध में हुआ है या नहीं।
सर्च इंजन पर दिखने वाला नंबर हमेशा आधिकारिक नहीं
साइबर अपराध का यह मामला ऑनलाइन कारोबार करने वाले व्यापारियों के लिए महत्वपूर्ण चेतावनी भी है। किसी कंपनी का नाम गूगल सर्च या ऑनलाइन मैप पर दिखाई देना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वहां दर्ज संपर्क नंबर उसी कंपनी का आधिकारिक नंबर है। साइबर अपराधी कई बार कंपनियों के नाम से मिलते-जुलते प्रोफाइल, लिस्टिंग अथवा संपर्क विवरण का इस्तेमाल कर लोगों को अपने जाल में फंसाते हैं। कारोबारी लेनदेन में यही छोटी-सी लापरवाही बड़े आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है।
डिजिटल कारोबार पर खड़े हुए सवाल
आगरा के इस मामले ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि डिजिटल कारोबार की सुविधा के साथ सत्यापन की जिम्मेदारी भी उतनी ही जरूरी है। सर्च इंजन पर मिली जानकारी को अंतिम सत्य मानने के बजाय कंपनी, बैंक खाता, GST विवरण, वेबसाइट और माल की वास्तविक आपूर्ति—हर स्तर पर पुष्टि करना साइबर ठगी से बचाव का अहम कदम है।












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