
ओ.पी. पाल (स्वतंत्र पत्रकार)
भारत की बुलेट ट्रेन परियोजना देश के परिवहन इतिहास का सबसे बड़ा और महत्वाकांक्षी कदम है। एक मायने में यह परियोजना महज़ ईंट, गारे, लोहे और कंक्रीट से ढांचा खड़ा करने की कहानी नहीं है। यह कहानी है नए भारत के उस ऊंचे कल्पनाशिल्प की, जो अब धीमी रफ्तार से संतुष्ट नहीं होना चाहता। यह परियोजना भारत की तकनीकी संप्रभुता, आर्थिक सुदृढ़ता और वैश्विक साख का प्रतीक यानी भारत के भविष्य की आधारशिला है। परियोजना में जमीन अधिग्रहण की बाधाओं, कोविड महामारी के थपेड़ों और लागत में वृद्धि जैसी तमाम चुनौतियों का सीना चीरकर जिस तरह आज वायाडक्ट्स और अंडर-सी टनल का काम अपनी अंतिम परिणति की ओर बढ़ रहा है, उसके मद्देनजर वर्तमान प्रगति को लेकर यह कहा जा सकता है कि भारत में बुलेट ट्रेन चलाने की तैयारी निर्णायक चरण में पहुंच चुकी है क्योंकि साल 2026 में सूरत और बिलिमोरा के बीच होने वाला ट्रायल रन इस बात का उद्घोष होगा कि भारत अब बदल चुका है। जब 320 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से यह ट्रेन भारत की धरती पर दौड़ेगी तो वह केवल दो शहरों की दूरी को कम नहीं करेगी, बल्कि वह देश के करोड़ों युवाओं के सपनों को एक नई उड़ान और असीम गति प्रदान करेगी। बुलेट ट्रेन का आना भारत के परिवहन इतिहास का एक ऐसा स्वर्णिम अध्याय है जिसका असर आने वाली कई पीढ़ियां महसूस करेंगी।
भारत हमेशा से एक ऐसा राष्ट्र रहा है जिसने अपनी परंपराओं को सहेजते हुए आधुनिकता की ओर कदम बढ़ाए हैं। बैलगाड़ी और भाप के इंजनों से शुरू हुआ हमारा परिवहन का सफर आज वंदे भारत जैसी सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनों तक पहुंच चुका है। लेकिन, इक्कीसवीं सदी का भारत अब सिर्फ रफ्तार की दौड़ में शामिल नहीं होना चाहता, बल्कि वह दुनिया के विकसित देशों के समकक्ष खड़े होकर ‘हाई-स्पीड रेल युग’ का नेतृत्व करना चाहता है। इस सपने को हकीकत में बदलने का ही नाम है-मुंबई-अहमदाबाद हाई स्पीड रेल प्रोजेक्ट, जिसे आम बोलचाल में हम ‘देश की पहली बुलेट ट्रेन’ कहते हैं।


भारत में हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की परिकल्पना लगभग एक दशक पहले की गई थी। साल 2015 में भारत और जापान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। जापान, जो अपनी ‘शिंकानसेन’ तकनीक के लिए दुनिया भर में मशहूर है और जिसने पिछले कई दशकों में शून्य दुर्घटना का रिकॉर्ड बनाए रखा है, इस परियोजना के लिए भारत का रणनीतिक साझेदार बना। सितंबर 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने अहमदाबाद में इस बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना की आधारशिला रखी थी। जापान न केवल भारत को अपनी सबसे सुरक्षित और उन्नत तकनीक का हस्तांतरण कर रहा है, बल्कि बेहद मामूली ब्याज दर पर इस परियोजना के लिए एक बड़ा वित्तीय लोन भी उपलब्ध करा रहा है।
स्टेशन, रूट और रफ्तार का गणित

मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल कॉरिडोर की कुल लंबाई 508 किलोमीटर है। यह कॉरिडोर भारत के दो सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक राज्यों गुजरात और महाराष्ट्र के साथ-साथ केंद्र शासित प्रदेश दादरा और नगर हवेली से होकर गुजरेगा। इस ट्रैक पर बुलेट ट्रेन की अधिकतम परिचालन गति 320 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित की गई है। वर्तमान में मुंबई से अहमदाबाद के बीच पारंपरिक ट्रेनों या सड़क मार्ग से यात्रा करने में 6 से 7 घंटे का समय लगता है। बुलेट ट्रेन के पूरी तरह शुरू होने के बाद यह सफर सिमटकर महज दो से ढाई घंटे का रह जाएगा। यह समय की वह बचत है जो कॉर्पोरेट जगत, व्यापारियों और आम यात्रियों की उत्पादकता को कई गुना बढ़ा देगी। इस पूरे मार्ग में कुल 12 स्टेशन बनाए जा रहे हैं। ये स्टेशन किसी आधुनिक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की तर्ज पर विकसित किए जा रहे हैं, जहां यात्रियों को विश्वस्तरीय सुविधाएं मिलेंगी। इन स्टेशनों में मुंबई (बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स) इस रूट का एकमात्र पूरी तरह से भूमिगत स्टेशन होगा। जबकि अन्य स्टेशनों में ठाणे, विरार, बोइसर, वापी, बिलिमोरा, सूरत, भरूच, वडोदरा, आनंद, अहमदाबाद और साबरमती शामिल हैं। ताजा रिपोर्ट के अनुसार अब तक 434 किलोमीटर तक पिलर (खंभों) का निर्माण पूरा हो चुका है। पटरी बिछाने के लिए 343 किलोमीटर से अधिक का वायाडक्ट बनकर तैयार है। गुजरात के सूरत, आनंद और अहमदाबाद जैसे स्टेशनों के विशालकाय ढांचे अब दूर से ही दिखाई देने लगे हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि सूरत-बिलिमोरा के बीच 2026 के ट्रायल के बाद, वर्ष 2029 से 2030 तक यह पूरा 508 किलोमीटर का कॉरिडोर पूर्ण रूप से चालू होकर देश को समर्पित कर दिया जाएगा।
समुद्र के नीचे सुरंग से भूकंप अलार्म तक
यह परियोजना केवल पटरी बिछाने और ट्रेन दौड़ाने का काम नहीं है, बल्कि यह भारत के सिविल इंजीनियरिंग इतिहास की सबसे कठिन और विस्मयकारी परीक्षाओं में से एक है। इस परियोजना का सबसे चुनौतीपूर्ण और रोमांचक हिस्सा महाराष्ट्र के घनसोली और शिलफाटा के बीच बनने वाली 21 किलोमीटर लंबी सुरंग है। इस सुरंग की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसका 7 किलोमीटर का हिस्सा ठाणे क्रीक के नीचे, यानी समुद्र के तलहटी के नीचे से गुजरेगा। भारत के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है जब कोई हाई-स्पीड रेल समुद्र के नीचे से गुजरेगी। इस सुरंग को खोदने के लिए दुनिया की सबसे विशालकाय टनल बोरिंग मशीनों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे 16 किलोमीटर का हिस्सा तैयार होगा। बाकी का 5 किलोमीटर का हिस्सा ‘न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड’ जैसी उन्नत ड्रिलिंग तकनीक से तैयार किया जा रहा है। अब तक 4.8 किलोमीटर टनल का काम सफलतापूर्वक पूरा भी हो चुका है। इसके अलावा सुरक्षा और जमीन के सही उपयोग को ध्यान में रखते हुए इस पूरी लाइन का एक बड़ा हिस्सा ‘एलिवेटेड’ यानी खंभों के ऊपर वायाडक्ट के माध्यम से बनाया जा रहा है। एनएचएसआरसीएल के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन कॉरिडोर के लिए 28 स्टील ब्रिज की योजना है, जिनमें शामिल 17 स्टील ब्रिज में से 14 स्टील ब्रिज गुजरात में पूरे हो चुके हैं। महाराष्ट्र में 4 नदी पुलों समेत वर्तमान में नर्मदा, माही, तापी और साबरमती जैसी देश की सबसे बड़ी और उफनती नदियों पर मेगा ब्रिज का निर्माण कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है।
शिंकानसेन तकनीक से सुरक्षा
इस परियोजना में जापान की शिंकानसेन तकनीक को अपनाने का सबसे बड़ा कारण इसकी सुरक्षा व्यवस्था है। भारत का एक बड़ा हिस्सा, विशेषकर पश्चिमी तट और गुजरात के कुछ क्षेत्र सिस्मिक जोन (भूकंप संभावित क्षेत्र) के अंतर्गत आते हैं। ट्रेक पर दौड़ती ट्रेन के लिए भूकंप की खतरनाक स्थिति से निपटने के लिए इस परियोजना में पहली बार जापानी तकनीक पर आधारित ‘अर्ली अर्थक्वेक वॉर्निंग सिस्टम’ लगाया जा रहा है। इस सुरक्षा कवच को मजबूत करने के लिए पूरे 508 किलोमीटर के रूट पर कुल 28 सीस्मोमीटर (भूकंप मापी यंत्र) स्थापित किए जा रहे हैं। इनमें से 22 सीस्मोमीटर सीधे मुख्य ट्रैक पर होंगे, जिनमें 14 गुजरात और 8 महाराष्ट्र के शामिल हैं। जबकि 6 सीस्मोमीटर उन अंदरूनी इलाकों में लगाए जाएंगे, जो भूगर्भीय रूप से अत्यधिक संवेदनशील (सिस्मिक जोन) माने जाते हैं।
आत्मनिर्भर भारत और ‘मेक इन इंडिया’ का तड़का
शुरुआत में इस परियोजना को पूरी तरह से जापानी आयात पर निर्भर माना जा रहा था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ और ‘मेक इन इंडिया’ के विजन ने इसकी दिशा बदल दी। वंदे भारत जैसी स्वदेशी सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनों की अभूतपूर्व सफलता के बाद भारत का आत्मविश्वास बढ़ा है। अब देश की अग्रणी निर्माण इकाइयां जैसे इंटीग्रल कोच फैक्ट्री और भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड मिलकर भारत की अपनी हाई-स्पीड ट्रेनों और उनके कल-पुर्जों के निर्माण में जुट गई हैं। ये स्वदेशी ट्रेनें 280 किलोमीटर प्रति घंटे की डिजाइन स्पीड के साथ तैयार की जा रही हैं। इसके अलावा, नेशनल हाई स्पीड रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने जापानी एजेंसियों के सहयोग से भारत के मानव संसाधन को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने का बीड़ा उठाया है। अब तक लगभग 1,000 भारतीय इंजीनियरों और तकनीशियनों को जापानी रेल प्रणालियों, ट्रैक बिछाने की कला और सुरक्षा मानकों की विशेष ट्रेनिंग दी जा चुकी है। इसका दूरगामी लाभ यह होगा कि भविष्य में जब भारत अन्य रूटों पर बुलेट ट्रेन बनाएगा, तो हमें विदेशी विशेषज्ञों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
परियोजना की वर्तमान स्थिति, चुनौतियां और लागत
वर्ष 2026 तक इस मेगा प्रोजेक्ट ने जमीन पर एक विशाल आकार ले लिया है। हालांकि, यह सफर इतना आसान नहीं था। परियोजना को अपने शुरुआती वर्षों में कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। महाराष्ट्र में पालघर और ठाणे के इलाकों में किसानों और स्थानीय निवासियों के विरोध के कारण भूमि अधिग्रहण में लंबा समय लगा। राजनीतिक इच्छाशक्ति और मुआवजे के उचित वितरण के बाद अब महाराष्ट्र में भी शत-प्रतिशत भूमि अधिग्रहित की जा चुकी है। इससे पहले साल 2020-21 के दौरान वैश्विक महामारी के कारण सप्लाई चेन टूट गई और श्रमिकों के पलायन से काम की रफ्तार धीमी पड़ गई। ऐसे में जाहिर सी बात है कि भूमि अधिग्रहण में देरी, पुनर्वास मुआवजा और तकनीकी अपग्रेडेशन के कारण परियोजना के बजट में बढ़ोतरी हुई है। शुरुआत में इस परियोजना की अनुमानित लागत 1.08 लाख करोड़ रुपये थी, जो अब विभिन्न कारणों से बढ़कर 1.6 लाख करोड़ से 2 लाख करोड़ रुपये के बीच पहुंचने का अनुमान है।
भारत के भविष्य का रोडमैप
इस परियोजना के तहत मुंबई-अहमदाबाद तो महज क शुरुआत है। इस परियोजना से मिलने वाले अनुभव और तकनीकी विशेषज्ञता के आधार पर भारत सरकार ने देश के अन्य प्रमुख महानगरों को भी हाई-स्पीड रेल नेटवर्क से जोड़ने का एक व्यापक खाका तैयार किया है। भविष्य में जिन रूटों पर बुलेट ट्रेन चलाने पर विचार और व्यवहार्यता अध्ययन चल रहा है, उनमें धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए दिल्ली-वाराणसी कॉरिडोर, दिल्ली-अमृतसर कॉरिडोर, मुंबई-नागपुर कॉरिडोर, मुंबई-हैदराबाद कॉरिडोर, चेन्नई-बेंगलुरु-मैसूर कॉरिडोर और वाराणसी-कोलकाता कॉरिडोर शामिल है। मसलन भविष्य का भारत ‘हीरक चतुर्भुज’ परियोजना के तहत दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई को हाई-स्पीड ट्रेनों के माध्यम से जोड़ने का सपना देख रहा है।












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