
– ओ.पी. पाल (स्वतंत्र पत्रकार)
तमिलनाडु की राजनीति को समझने के लिए अक्सर वहां की रैलियों का शोर और सिनेमाई सितारों का ‘कट-आउट’ काफी माना जाता रहा है। लेकिन 23 अप्रैल 2026 को विधानसभा की 234 सीटो पर होने वाले चुनाव से ठीक पहले राज्य की गलियों में पसरा ‘सन्नाटा’ किसी खामोशी का नहीं, बल्कि एक बहुत बड़े सियासी मंथन का संकेत है। इस बार का चुनाव केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह इस बात का लिटमस टेस्ट है कि क्या 50 साल पुराना द्रविड़ वर्चस्व अब बहु-ध्रुवीय राजनीति के सामने झुकने को तैयार है? यानी एक गहरी राजनैतिक परिपक्वता और त्रिस्तरीय मुकाबले का संकेत है। विशेषकर महिला मतदाता, जो राज्य की आबादी का 51 प्रतिशत हैं, उन्होंने अपनी चुप्पी से डीएमके और एआईएडीएमके दोनों खेमों की नींद उड़ा दी है। हालांकि सभी राजनीतिक दल अपनी नई चुनावी रणनीति के साथ चुनावी जंग में हैं।


तमिलनाडु राजनीति के इतिहास पर नजर डाली जाए, तो चुनाव में तमिलनाडु की राजनीति में इस समय द्रविड़ दलों यानी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एडीएमके) को अक्सर एक राजनीतिक महाशक्ति के रूप में देखा जाता है। ये दोनों प्रमुख दल ही पिछले दशकों से राज्य पर शासन करते आ रहे हैं। लेकिन तमिलनाडु विधानसभा चुनाव को लेकर इस बार सियासी तस्वीर काफी बदली हुई नजर आ रही है। जहां पहले चुनावों में किसी एक पार्टी या गठबंधन की लहर नजर आती थी, वहीं इस बार ऐसा कोई सियासी परिदृश्य नहीं है। राजग और इंडिया गठबंधन दोनों अपनी-अपनी रणनीति के साथ मैदान में हैं, लेकिन जनता का मूड अभी भी शांत और सोच-समझकर फैसला लेने वाला दिख रहा है। राज्य में चुनावी सरगिर्मयों के बीच इस बार चुनावी रैलियों में वह पारंपरिक उन्माद नहीं दिख रहा, जो कभी एमजीआर, जयललिता या करुणानिधि के दौर में होता था। इस बार मतदाता मौन है और लगता है कि जनता इस बार उम्मीदवारों के चेहरों को नहीं, बल्कि उनके ट्रैक रिकॉर्ड को तौल रही है। यह सन्नाटा बताता है कि मतदाता इस बार ‘लहर’ के बहाव में नहीं, बल्कि ‘परिणाम’ के प्रभाव पर वोट करेगा। मसलन इस बार का चुनाव यह तय करेगा कि क्या तमिलनाडु अपनी पारंपरिक द्रविड़ सीमाओं में ही रहेगा या फिर वह राष्ट्रीय मुख्यधारा की राजनीति और नए क्षेत्रीय चेहरों के लिए अपने दरवाजे खोलेगा। दरअसल जब तमिलनाडु का मतदाता शांत होता है, तो वह अक्सर किसी बड़े ‘उलटफेर’ की पटकथा लिख रहा होता है। 4 मई के नतीजे केवल एक मुख्यमंत्री नहीं चुनेंगे, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति की अगली आधी सदी का रुख तय करेंगे।

डीएमके का वर्चस्व और एडीएमके का अस्तित्व
सत्ताधारी डीएमके अपने ‘द्रविड़ मॉडल’ और महिला केंद्रित कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे मैदान में है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के लिए यह चुनाव अपनी विरासत को स्थायी बनाने की लड़ाई है। इसमें उनका मजबूत कैडर और सरकारी योजनाओं की जमीनी पहुंच मानी जा रही है। हालांकि मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का चेहरा सबसे बड़ा है, लेकिन गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस, छोटे दलों और वामपंथी दलों में दबी हुई नाराजगी के साथ ही कार्यकर्ताओं के बीच जमीनी स्तर पर तालमेल की कमी एक ‘अदृश्य दरार’ पैदा कर रही है। वहीं सनातन धर्म जैसे विवादित बयानों ने जिस तरह राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन को असहज किया है, उसका असर स्थानीय स्तर पर भाजपा भुनाने की कोशिश कर रही है। भाजपा के लिए तमिलनाडु हमेशा से एक ‘अजेय दुर्ग’ रहा है, लेकिन इस बार पार्टी ने अपनी रणनीति बदली है। एआईएडीएमके के साथ दोबारा हुए गठबंधन ने राजग को नई ऊर्जा दी है। हालांकि एआईएडीएमके का आंतरिक नेतृत्व संकट अभी भी पूरी तरह सुलझा नहीं है। के. अन्नामलाई के नेतृत्व में भाजपा ने खुद को ‘आक्रामक विपक्ष’ के रूप में पेश किया है। वे हिंदुत्व को ‘तमिल गौरव’ से जोड़कर उस वैचारिक चक्रव्यूह को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, जिसे द्रविड़ राजनीति ने दशकों से बनाया था। वहीं इस चुनाव में अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिझगा वेत्री कझगम (टीवीके) इस चुनाव के सबसे बड़े ‘ब्लैक हॉर्स’ साबित हो सकते हैं। पहली बार वोट देने वाले करोड़ों युवा, जो पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग विकल्प ढूंढ रहे हैं। यह विजय का ‘फैन बेस’ अगर पोलिंग बूथ तक पहुँचा, तो वह बड़े-बड़े दिग्गजों का सियासी गणित बिगाड़ सकता है।
मुख्यधारा के दलों का ‘ब्राह्मण मुक्त’ दांव
तमिलनाडु की सियासत में 2026 का विधानसभा चुनाव एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व मोड़ पर खड़ा है। राज्य के राजनीतिक इतिहास में शायद यह पहला मौका है जब डीएमके, एडीएमके, भाजपा और कांग्रेस जैसे सभी मुख्यधारा के दलों ने किसी भी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है। राज्य में करीब 3 फीसदी ब्राह्मण आबादी वाले इस समुदाय का मुख्यधारा की चुनावी राजनीति से यह ‘पूर्ण निर्वासन’ कई गहरे सवाल खड़े करता है। जयललिता (जो स्वयं ब्राह्मण थीं) के दौर में पार्टी इस समुदाय की स्वाभाविक पसंद थी, लेकिन 35 साल में पहली बार एआईएडीएमके ने एक भी ब्राह्मण चेहरा मैदान में नहीं उतारा है। वहीं हिंदुत्व की राजनीति करने वाली भाजपा ने भी अपने कोटे की 27 सीटों पर किसी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया। जबकि जयललिता के निधन के बाद यह समुदाय पूरी तरह भाजपा की ओर शिफ्ट हो गया। भाजपा ने संगठन में तो एच. राजा और के.टी. राघवन जैसे चेहरे रखे हैं, लेकिन चुनावी जंग के लिए ओबीसी और दलित कार्ड पर भरोसा जताया है। इससे यही संकेत मिलता है कि भाजपा की रणनीति अब ‘ब्राह्मण-बनिया’ छवि से बाहर निकलकर ‘पिछड़ा वर्ग’ की पार्टी बनने की है, ताकि वह द्रविड़ दलों के कोर वोट बैंक में सेंध लगा सके। इसी प्रकार द्रविड़ विचारधारा की ध्वजवाहक डीएमके के लिए यह कोई नई बात नहीं है, लेकिन कांग्रेस ने भी इस बार सामाजिक समीकरणों के चलते ब्राह्मण समुदाय से दूरी बना ली है। जबकि सीमन की ‘नाम तमिलर काची’ (एनटीके) ने सबसे ज्यादा 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों (4 महिलाएं, 2 पुरुष) को टिकट दिया है। सीमन का तर्क है कि तमिल ब्राह्मण भी मूल तमिल हैं, जो पेरियारवादी राजनीति के ‘ब्राह्मण-विरोध’ से बिल्कुल अलग रुख है।
त्रिकोणीय मुकाबले की उम्मीद?
राजग द्रविड संस्कृति वाली सियासत के इस चुनावी मुकाबले को नई रणनीति के साथ उतरी है। पिछले लोकसकभा चुनाव में एडीएमके से टूटे रिश्ते बहाल करके भाजपा अब विधानसभा के चुनावी मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की इस रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। एडीएमके के नेतृत्व में राजग गठबंधन में एडीएमके ने खुद 178 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि सहयोगी दलों में भाजपा को 27 औ पीएमके को 18 सीट दी हैं। वहीं इंडिया गठबंधन गठबंधन के फॉर्मूले के तहत डीएमके 164 सीटों पर खुद चुनाव लड़ेगी, जबकि 70 सीटें कांग्रेस और अन्य सहयोगियों को दी गई हैं, जिसमें कांग्रेस को 28 सीटें मिली हैं। तमिलनाडु की राजनीति में डीएमके और एडीएमके जैसे प्रमुख दलों के अलावा के. कृष्णा सामी की पुथिया तमिलागम, जीके वासन की तमिल मनीला कांग्रेस(मूपनार), भाकपा, सीपीआईएम, वीसीके, आईयूएमएल, वाइको की एमडीएमके, एसी शनमुगम की पीएनके जैसे दल चुनावी जंग में रहे हैं।
महिलाएं और युवा बन सकती है ‘गेम चेंजर’
तमिलनाडु की जनसंख्या में 80 प्रतिशत ओबीसी और लगभग 24 प्रतिशत एमबीसी आबादी है। भाजपा और डीएमके दोनों ने ही अपने उम्मीदवारों की सूची में इस सामाजिक संतुलन को साधने की कोशिश की है। वहीं राज्य की लगभग 12-15 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी (मुस्लिम और ईसाई) इस बार निर्णायक भूमिका में होगी। आमतौर पर अल्पसंख्यक वोट बैंक पारंपरिक रूप से डीएमके की ओर जाता रहा है, लेकिन अगर एडीएमके और टीवीके ने खुद को एक धर्मनिरपेक्ष विकल्प के रूप में मजबूती से पेश किया, तो यहां बिखराव देखने को मिल सकता है। अल्पसंख्यक वोटों का यह बिखराव सीधे भाजपा-एआईएडीएमके गठबंधन के लिए राह आसान हो सकता है। दूसरा पहलू ये भी है कि तमिलनाडु में लगभग 51 प्रतिशत महिला मतदाता किसी भी चुनाव का रुख बदल सकती हैं। वहीं युवा मतदाता बड़ी संख्या में हैं, जिनका रुझान विजय की टीवीके का प्रभाव जरूर है, लेकिन यह वोट में कितना बदलेगा, यह चुनाव के दिन ही पता चलेगा। इसलिए महिला और युवा वोटर इस बार चुनाव के सबसे बड़े ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है।












Total views : 272466