Select Language :

Home » राजनीति » बिजली बिल 2025 पर ‘पावर’ वार: देशभर के 27 लाख कर्मचारी हड़ताल की राह पर

बिजली बिल 2025 पर ‘पावर’ वार: देशभर के 27 लाख कर्मचारी हड़ताल की राह पर

सरकार का दावा: प्रतिस्पर्धा से सुधरेगी सर्विस, निजीकरण और सब्सिडी को लेकर छिड़ी जंग
लोकपथ लाइव, नई दिल्ली: केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विद्युत संशोधन विधेयक ने देश के ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़ा संवैधानिक और आर्थिक विवाद खड़ा कर दिया है। जहाँ सरकार इसे बिजली क्षेत्र को आधुनिक बनाने के लिए ‘गेम चेंजर’ बता रही है, वहीं देशभर के करीब 27 लाख बिजली कर्मचारी और इंजीनियर इसके खिलाफ सड़क पर उतरने की तैयारी कर रहे हैं। इस हड़ताल में लाइनमैन से लेकर उच्च अधिकारी तक शामिल हैं, जिनका मानना है कि यह बिल सरकारी वितरण कंपनियों के पतन की शुरुआत है।

How to Make a News Portal

इस बिल का सबसे विवादास्पद हिस्सा बिजली वितरण में प्रतिस्पर्धा लाना है। सरकार चाहती है कि उपभोक्ताओं को यह विकल्प मिले कि वे अपनी बिजली कंपनी खुद चुनें, ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल सिम कार्ड चुनते हैं। इस प्रस्ताव में एक ही क्षेत्र में निजी कंपनियां सरकारी बिजली नेटवर्क का इस्तेमाल कर बिजली बेच सकेंगी। जबकि यूनियनों का तर्क है कि निजी कंपनियां केवल मुनाफा देने वाले औद्योगिक और शहरी क्षेत्रों को चुनेंगी (‘चेरी पिकिंग’), जिससे सरकारी कंपनियां केवल घाटे वाले ग्रामीण इलाकों तक सीमित रह जाएंगी और अंततः दिवालिया हो जाएंगी।

दो बार संसद में पेश हो चुका बिल
केंद्र सरकार वर्ष 2014 से अभी तक दो बार संसद में पेश कर चुकी है। दो बार इस विधेयक को संसदीय समितियों को भेजा गया और तीन बार अलग से इसका ड्राफ्ट तैयार किया गया, फिर भी कभी राज्यों के विरोध की वजह से तो कभी कुछ अन्य वजहों से सरकार इस पर दो टूक कदम नहीं उठा पाई। हद तो यह है कि केंद्र सरकार ने कुछ ही हफ्तों के भीतर सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (शांति) बिल, 2025 को अंतिम रूप भी दे दिया और उसे पारित भी करा लिया लेकिन बिजली संशोधन विधेयक, 2025 पर मशविरा का दौर चलता ही जा रहा है।

किसानों और मध्यम वर्ग की चिंता: सब्सिडी का क्या होगा?
किसान संगठनों ने इस बिल को ‘खेती के लिए खतरा’ बताया है। वर्तमान में राज्यों द्वारा किसानों और गरीब उपभोक्ताओं को भारी सब्सिडी या मुफ्त बिजली दी जाती है। यदि वितरण निजी हाथों में गया, तो ‘डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर’ (DBT) के नाम पर सब्सिडी की वर्तमान व्यवस्था चरमरा सकती है और उपभोक्ताओं को पहले पूरी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

राज्यों के अधिकारों पर ‘शॉक’
संविधान के अनुसार, बिजली एक समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है, जिस पर केंद्र और राज्य दोनों का अधिकार है। विपक्षी दलों और कई राज्यों का आरोप है कि इस बिल के जरिए केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण कर रही है। वितरण का नियंत्रण केंद्र की ओर झुकने से राज्यों की नीतियों (जैसे मुफ्त बिजली योजनाएं) को लागू करना कठिन हो जाएगा।

सरकार का पक्ष: आधुनिक भारत के लिए जरूरी
दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि डिजिटल इंडिया, इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और बढ़ते डेटा सेंटर्स के कारण देश में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। सरकार के अनुसार पुराने और घाटे में चल रहे इंफ्रास्ट्रक्चर को निजी निवेश के बिना नहीं सुधारा जा सकता। प्रतिस्पर्धा आने से सेवाओं की गुणवत्ता (Quality of Supply) बढ़ेगी और बिजली कटौती कम होगी। पारदर्शी नियामक ढांचा तैयार होने से बिजली क्षेत्र टिकाऊ बनेगा।

देशव्यापी ‘ब्लैकआउट’ की आशंका
निष्कर्ष: फिलहाल बिजली कर्मचारी महासंघ ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि बिल के प्रावधानों पर पुनर्विचार नहीं किया गया, तो देशव्यापी ‘ब्लैकआउट’ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। क्या आप इस बिल के उन तकनीकी पहलुओं को समझना चाहते हैं जिनसे आपकी बिजली की दरों पर सीधा असर पड़ेगा?

 

Share this post:

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments

खबरें और भी हैं...

वोट करें

Are You Satisfied Lokpath Live

Our Visitor

0 8 3 6 5 3
Total views : 262581

Follow us on