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यूपी: अब झूठा मुकदमा कराने वालों की आएगी शामत!

शिकायतकर्ता के साथ गवाहों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डीजीपी को दिए सख्त निर्देश
लोकपथ लाइव, प्रयागराज: उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त निर्देश दियक हैं कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता और उनके गवाहों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। हाई कोर्ट ने अलीगढ़ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए यह आदेश अलीगढ़ के एक व्यक्ति की एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने के बाद जारी किये हैं।

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इलाहाबाद हाई कोर्ट में अलीगढ़ निवासी उम्मे फारवा ने याचिका दायर कर अपने पूर्व पति महमूद आलम खान द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर को चुनौती दी थी। याची ने पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को सही ठहराते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा प्रोटेस्ट याचिका स्वीकार कर केस कायम करने की कार्रवाई को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग बताया था। इस मामलं में हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने आदेश दिया है कि यदि किसी मामले की विवेचना के बाद यह निष्कर्ष निकलता है कि कोई अपराध बनता ही नहीं है और अंतिम/क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जाती है, तो विवेचना अधिकारी को शिकायतकर्ता एवं गवाहों के विरुद्ध लिखित शिकायत भी प्रस्तुत करनी होगी। इस मामले का गंभीरता से संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने झूठी एफआईआर दर्ज कराने की बढ़ती प्रवृत्ति पर सख्त फैसला लियाऔर कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि झूठी एफआईआर दर्ज कराने वाले शिकायतकर्ता ही नहीं, बल्कि उनके गवाहों के खिलाफ भी आपराधिक कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट के निर्देश के अनुसार पुलिस महानिदेशक, पुलिस आयुक्त, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, पुलिस अधीक्षक यह सुनिश्चित करें कि सभी विवेचना अधिकारी, थाना प्रभारी, सर्किल अधिकारी, अपर पुलिस अधीक्षक एवं लोक अभियोजक अंतिम/क्लोजर रिपोर्ट के साथ आवश्यक शिकायत भी अनिवार्य रूप से दाखिल किया जाएगा। इस आदेश के अनुपालन के लिए 60 दिनों की समय-सीमा तय की गई है।

क्या है अदालत के निर्देश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को जरी निर्देश में स्पष्ट किया है कि यदि इस कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी की गई तो विवेचना अधिकारी, थाना प्रभारी, सर्किल अधिकारी ही नहीं, बल्कि संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के खिलाफ भी विभागीय कार्रवाई और अदालत की अवमानना की कार्यवाही हो सकती है। इस संबंध में हाई कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया है कि वे अधीनस्थ अधिकारियों के लिए आवश्यक आदेश जारी करें। कोर्ट ने कहा कि यदि विवेचना अधिकारी अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत करता है, तो केवल रिपोर्ट दाखिल करना पर्याप्त नहीं होगा। निर्देश में कहा गया कि पुलिस रेगुलेशन के अनुसार झूठी सूचना देने के लिए विधिवत शिकायत दर्ज कराना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के आचरण के विरुद्ध हाई कोर्ट में उचित कार्रवाई के लिए संपर्क किया जा सकता है।

न्याय प्रणाली में क्या है प्रावधान
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस को झूठी एफआईआर दर्ज कराने वालों पर आईपीसी की धारा 212 और 217 (नए बीएनएसएस की धारा 215(1) के तहत) में अनिवार्य रूप से कार्रवाई करने और शिकायत दर्ज करने का आदेश न्याय प्रणाली का दुरुपयोग रोकने की दिशा में अहम है। वहीं झूठी गवाही देने पर आईपीसी की धारा 191/193 के तहत 7 साल तक की सज़ा का प्रावधान है और कोर्ट ऐसे मामलों में भारी जुर्माना भी लगा रहे हैं, जिससे न्याय प्रणाली का दुरुपयोग रुक सके।

 

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