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हरियाणवी संस्कृति को मिलेगा वैश्विक मंच: सिनेमा और लोककला के जरिए बदलेगा समाज

रोहतक में जुटे सूबे के रागिनी गायक, सांगी, फिल्मकार और शिक्षाविद, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण सामूहिक
लोकपथ लाइव, रोहतक: हरियाणा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, लोककला, सिनेमा और भारतीय सामाजिक मूल्यों के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर रोहतक में एक दिवसीय ‘कला, सिनेमा और समाज परिवर्तन’ संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस विचार-मंथन कार्यक्रम में हरियाणा के लगभग सभी जिलों से आए रागिनी गायकों, सांगियों, फिल्म लेखकों, अभिनेताओं, निर्देशकों, रंगमंच कर्मियों और विभिन्न विधाओं के विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इसमें फिल्मी और लोक कलाकारों के साथ-साथ विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों ने भी बढ़-चढ़कर भागीदारी की, जिससे कला और अकादमिक जगत का एक अनूठा संगम देखने को मिला।

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सांस्कृतिक विरासत के सकारात्मक पक्षों को मिले पहचान: राजेश जी
वैश्य कॉलेज के सहायक प्रोफेसर अर्जुन गुप्ता ने इस संगोष्ठ की जानकारी देते हुए बताया कि कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख राजेश जी ने कहा कि हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत अत्यंत समृद्ध और गौरवशाली रही है। लोककला, लोकभाषा, लोकसंगीत और सामाजिक मूल्यों के क्षेत्र में इस प्रदेश का हमेशा से महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हालांकि, उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि समय के साथ हरियाणा के अनेक सकारात्मक पक्षों को वह अपेक्षित पहचान नहीं मिल पाई जिसके वे हकदार थे। आज समाज के सामने हरियाणा की वास्तविक, शालीन और समृद्ध सांस्कृतिक पहचान को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की महती आवश्यकता है। उन्होंने बेहद कलात्मक और सुगठित तरीके से मंच का संचालन करते हुए सभी विधाओं के कलाकारों को एक सूत्र में पिरोया।

डिजिटल और सिनेमाई मंचों पर लोकनायकों की कहानियां
मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित करते हुए क्षेत्र प्रचार प्रमुख अनिल जी ने कहा कि हरियाणा में संस्कृति, लोककला और रचनात्मक अभिव्यक्तियों के क्षेत्र में असीम संभावनाएं मौजूद हैं। उन्होंने कलाकारों और फिल्मकारों का आह्वान करते हुए कहा कि हमें समाज के छोटे-छोटे अनुभवों, समृद्ध लोक परंपराओं, हमारे ऐतिहासिक लोकनायकों और आम जनजीवन की प्रेरणादायी कहानियों को फिल्मों, शॉर्ट फिल्मों और डिजिटल माध्यमों के जरिए व्यापक स्तर पर प्रस्तुत करना चाहिए। जब हमारी मिट्टी की कहानियां आधुनिक माध्यमों से सामने आएंगी, तो समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देगा।

मंथन के चार प्रमुख स्तंभ:
1. हरियाणवी लोककला और सांग परंपरा का पुनरुद्धार।
2. भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का सिनेमा में समावेश।
3. नई पीढ़ी को आधुनिक तकनीक (डिजिटल मीडिया) के जरिए विरासत से जोड़ना।
4. भ्रामक प्रस्तुतीकरण को रोककर हरियाणा की वास्तविक पहचान स्थापित करना।

सौंपे गए सुझाव
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में वैचारिक गहराई लाने के लिए सभी प्रतिभागियों को चार प्रमुख कार्य समूहों में विभाजित किया गया। इन समूहों में सिनेमा, रंगमंच, लोकसंगीत और शिक्षा जगत के विशेषज्ञों ने अलग-अलग विषयों पर घंटों विस्तार से चर्चा की। सभी समूहों ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कैसे जोड़ा जाए और हरियाणवी सिनेमा को अश्लीलता व रूढ़िवादिता से दूर रखकर एक पारिवारिक व वैचारिक सिनेमा के रूप में कैसे स्थापित किया जाए।

कला और सृजन को नया आयाम देने की कवायद
समापन सत्र में दादा लक्ष्मी चंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विश्वविद्यालय (SUPVA) के कुलगुरू प्रो. अमित आर्य ने सभी आगंतुकों का धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने विश्वास दिलाया कि उनका विश्वविद्यालय कला, संस्कृति और सृजनात्मक अभिव्यक्तियों के क्षेत्र में शोध और नए प्रयोगों के जरिए नई ऊंचाइयों को प्राप्त करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि अकादमिक स्तर पर लोककलाकारों को पूरा सहयोग दिया जाएगा।

सकारात्मक योगदान से ही होगा राष्ट्र निर्माण
कार्यक्रम के अंतिम चरण में मार्गदर्शन देते हुए प्रांत संघ चालक माननीय प्रताप जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कार्यक्षेत्र में सकारात्मक और निस्वार्थ योगदान देकर समाज और राष्ट्र के लिए एक बेहतर वातावरण का निर्माण कर सकता है। कला और सिनेमा का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना होना चाहिए।

सामूहिक संकल्प के साथ समापन
इस गरिमामयी संगोष्ठी का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। कार्यक्रम के अंत में सभी प्रतिभागियों ने देश में सांस्कृतिक चेतना जगाने, सामाजिक समरसता को मजबूत करने और राष्ट्र निर्माण के लिए निरंतर कार्य करने का सामूहिक संकल्प लिया।

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