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औवेसी की लोकसभा सदस्यता पर मंडराया खतरा?

जय फिलिस्तीनी के नारे पर राष्ट्रपति से सदस्यता रद्द करने की मांग

LP Live, New Delhi: 18वीं लोकसभा के लिए हैदराबाद से निर्वाचितत एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी के शपथ ग्रहण के दौरान लगाए गये ‘जय भीम…जय मीम…जय तेलंगाना…जय फिलिस्तीन…तकबीर, अल्लाह-ओ-अकबर’ ओवैसी के नारों से विवाद बढ़ गया है। इसमें ‘जय फिलिस्तीन’ के नारे लगाने पर ओवैसी की सदस्यता पर खतरा मंडराता नजर आ रहा है, जिसकी सदस्यता रद्द करने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से शिकायत की गई है।

लोकसभा में में मंगलवार को शपथ ग्रहण के दौरान औवेसी ‘जय भीम, जय तेलंगाना’. फिर ‘जय फलिस्तीन’ कहने के बाद उन्होंने अल्लाह-ओ-अकबर का नारा भी लगाने जमकर हंगामा हुआ। खासतौर से भाजपा सांसदरें पे अपनी आपत्ति जताते हुए विरोध दर्ज कराया। वहीं उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता हरि शंकर जैन ने राष्ट्रपति के समक्ष यह शिकायत दर्ज कराई है, जिसमें नियमों का हवाला देते हुए ओवैसी को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है। इसकी जानकारी शिकायतकर्ता के सुपुत्र एवं सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने मंगलवार देर रात एक सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए दी। उन्होंने एक्स पर लिखा कि श्री हरि शंकर जैन ने असदुद्दीन ओवैसी के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 102 और 103 के तहत राष्ट्रपति के समक्ष शिकायत दायर की है, जिसमें उन्हें संसद सदस्य के रूप में अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है।

क्या कहते हैं नियम
दरअसल संसद के मौजूदा नियमों के अनुसार किसी भी सदन के सदस्य को किसी विदेशी राज्य (देश) के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करने पर उसकी लोकसभा या किसी भी सदन की सदस्यता से अयोग्य ठहराया जा सकता है? एक्सवपर्ट के मुताबिकक या तो उन्हेंष फिर शपथ लेने को कहा जा सकता है, या फिर वे अयोग्यठहराए जा सकते हैं। कानूनी जानकारों का कहना है कि ओवैसी का बयान नियमों के विरुद्ध है। वो अपनी जनसभा में कोई तकरीर नहीं दे रहे थे, बल्कि संसद में बोल रहे थे। संविधान के अनुच्छेद 102 के मुताबिक अगर वह किसी और देश के प्रति निष्ठा जताता है, तो भी उसकी सदस्याता जा सकती है।

ओवैसी के केस में दावा किया जा रहा है कि उन्होंने फिलिस्तीन के प्रति निष्ठा् जताई है। ऐसे में 102 डी के मुताबिक उनकी सांसदी पर खतरा मंडरा रहा है। वहीं दो या इससे अधिक साल की सजा होने पर भी संसद की सदस्य्ता चली जाती है। अनुच्छेद 103 में राष्ट्रपति को यह अधिकार दिया गया है कि अनुच्छेद 102 के तहत कोई शिकायत प्राप्त होने पर वह संबंधित सांसद की योग्यता पर फैसला लें। हालांकि कोई भी फैसला लेने से पहले चुनाव आयोग से परामर्श करना जरूरी है।

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