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केरल विधानसभा चुनाव: भाजपा के लिए आसान नहीं ‘रेड कॉरिडोर’ पर भगवा फहराना

– ओ.पी. पाल (स्वतंत्र पत्रकार)
केरल में 9 अप्रैल, 2026 को होने वाले 140 सीटों के लिए विधानसभा चुनाव राज्य के राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ साबित होने वाले हैं। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाला वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) जहां लगातार तीसरी बार सत्ता में आकर इतिहास रचने की कोशिश में है, वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यूडीएफ) और भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा (राजग) अपनी पूरी ताकत झोंक रहे हैं। मसलन यह चुनाव केवल यह तय नहीं करेगा कि अगली सरकार किसकी होगी, बल्कि यह केरल के ‘द्वि-ध्रुवीय’ राजनीतिक ढांचे के भविष्य को भी तय करेगा। यदि एलडीएफ जीतता है, तो यह पिनाराई विजयन के ‘अजेय’ होने की पुष्टि करेगा। यदि यूडीएफ जीतता है, तो यह कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर संजीवनी का काम करेगा। वहीं राजग का प्रदर्शन यह बताएगा कि क्या भाजपा दक्षिण के इस दुर्ग में सेंध लगा पाई है। दूसरी ओर केरल की 15वीं विधानसभा का लेखा-जोखा राज्य की लोकतांत्रिक परिपक्वता और विधायी प्राथमिकताओं की एक स्पष्ट तस्वीर पेश करता है। पिछले पांच वर्षों का डेटा यह दर्शाता है कि जहाँ एक ओर कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है, वहीं दूसरी ओर विधायी समीक्षा की गहराई को लेकर कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न भी उठे हैं। फिर भी 4 मई को आने वाले नतीजे आएंगे, तो वह केवल एक सरकार का चुनाव नहीं होगा, बल्कि यह केरल के साक्षर और जागरूक मतदाताओं के उस ‘विवेक’ का परिणाम होगा, जो वैश्विक युद्ध से लेकर स्थानीय पेंशन तक हर पहलू को बारीकी से परखता नजर आएगा?
केरल की राजनीति मुख्य रूप से तीन ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और माकपा के नेतृत्व में यह गठबंधन नव केरल के विजन और पिछले 10 वर्षों के प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ मैदान में है। वाम लोकतांत्रिक मोर्चा ने अपने ‘दो कार्यकाल’ वाले कड़े नियम में ढील देकर यह साफ कर दिया है कि वह जीत के लिए कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता परिवर्तन की लहर पर सवार है। 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत ने यूडीएफ के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है। इन्होंने इंदिरा गारंटी के माध्यम से महिलाओं और युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। जबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व करने वाली भाजपा केरल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे क्षेत्रों में बढ़ते जनाधार के साथ, राजग इस बार ‘विकसित केरल’ के नारे के साथ किंगमेकर बनने की उम्मीद कर रहा है। सत्ता पक्ष को इसिलए वापसी की उम्मीद है कि उसने मौजूदा कार्यकाल के दौरान केरल की विधानसभा ने कामकाज के मामले में एक मानक स्थापित किया है, विशेषकर समितियों के उपयोग और बिलों के पारित होने की संख्या में वृद्धि सरकार की तीव्रता दर्शाता है। राज्य 2026 के चुनावों में ये विधायी रिकॉर्ड शासन के मॉडल को समझने में मतदाताओं के लिए एक प्रमुख आधार साबित हो सकता है। मसलन इस कार्यकाल के दौरान विधायी कार्यों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। पिछली विधानसभा (2016-21) में जहां 80 बिल पास हुए थे, वहीं 15वीं विधानसभा में यह संख्या बढ़कर 129 तक पहुंच गई। जो पिछले कार्यकाल की तुलना में 61 फीसदी की वृद्धि दर्शाता है। वहीं यह राज्य में व्यापक कानूनी और प्रशासनिक बदलावों का संकेत देती है। ऐसे में केरल की राजनीति इस समय एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ इतिहास और भविष्य का आमना-सामना हो रहा है। 140 सीटों और 2.7 करोड़ मतदाताओं वाले इस राज्य में चुनावी सरगर्मी अपने चरम पर है।
मुख्य गठबंधन और राजनीतिक समीकरण
केरल की राजनीति मुख्य रूप से तीन ध्रुवों के इर्द-गिर्द घूम रही है, जिसमें वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और माकपा के नेतृत्व में यह गठबंधन नव केरल के विजन और पिछले 10 वर्षों के प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ मैदान में है। जबकि कांग्रेस और मुस्लिम लीग के नेतृत्व में संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता परिवर्तन की लहर पर सवार है और कांग्रेस की 21 सीटो समेत 41 सीटों को बढ़ाकर दोगुना करने की रणनीति के साथ चुनाव मैदान में है। इसका कारण 2025 के स्थानीय निकाय चुनावों में मिली जीत ने यूडीएफ के कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा है। इन्होंने इंदिरा गारंटी के माध्यम से महिलाओं और युवाओं को लुभाने की कोशिश की है। जबिक राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चा के नेतृत्व करने वाली भाजपा केरल में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रही है। तिरुवनंतपुरम और त्रिशूर जैसे क्षेत्रों में बढ़ते जनाधार के साथ, राजग इस बार ‘विकसित केरल’ के नारे के साथ किंगमेकर बनने की उम्मीद कर रहा है। साल 2021 के विधानसभा चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (एलडीएफ) 97 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की थी।
प्रमुख चुनावी मुद्दे
इस बार का चुनाव केवल ‘कल्याणकारी योजनाओं’ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई नए आयाम जुड़े हैं, जिसमें शिक्षित बेरोजगारी, केरल में युवाओं का बड़े पैमाने पर विदेश एक बड़ा मुद्दा है। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है। आर्थिक प्रबंधन राज्य के बढ़ते कर्ज और वित्तीय संकट को लेकर यूडीएफ ने सरकार को घेरा है। मसलन कांग्रेस के लिए यह चुनाव ‘करो या मरो’ जैसा है। राहुल गांधी की ‘पुथुयुग यात्रा’ ने कार्यकर्ताओं में जान फूं की है। भ्रष्टाचार के आरोप और बेरोजगारी कें मुद्दे की सियसत के बीच राहुल गांधी का आरोप है कि सीपीआई(एम) और भाजपा के बीच कांग्रेस को रोकने के लिए एक अघोषित गठबंधन है। लेकिन पार्टी के भीतर नेतृत्व के चेहरे पर स्पष्टता की कमी और एलडीएफ के मजबूत कैडर बेस का मुकाबला करना कांग्रेस के सामने चुनौती होगा। भाजपा की रणनीति बेहद सटीक है। पार्टी ने पूरे राज्य के बजाय 30 चुनिंदा सीटों पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। त्रिशूर लोकसभा सीट पर जीत और तिरुवनंतपुरम नगर निगम पर कब्जे ने बीजेपी को मनोवैज्ञानिक बढ़त दी है। पारंपरिक रूप से वामपंथियों का आधार रहा हिंदू ईझवा समुदाय अब ‘भारत धर्म जनसेना’ और सीधे बीजेपी की ओर आकर्षित हो रहा है। वहीं भले ही प्रधानमंत्री मोदी पूरे राज्य में प्रचार कर रहे हैं, लेकिन भाजपा के लिए यह चुनावी डगर बेहद मुश्किल नजर आ रही है। इस चुनाव में अल्पसंख्यक मत मुस्लिम और ईसाई समुदायों का झुकाव निर्णायक होगा। एलडीएफ और यूडीएफ दोनों ही इन समुदायों को साधने में जुटे हैं। केरल राज्य में हालांकि सबसे ज्यादा 54.73 प्रतिशत हिंदू आबादी है, तो मुस्लिम आबादी 26.56 प्रतिशत और ईसाई आबादी 18.38 प्रतिशत है। जबकि केरल में रहने वाले सिक्खों, बौद्ध, जैन और अन्य धर्म के लोगों की संख्या एक प्रतिशत भी पूरी नहीं है।
सत्ता विरोधी लहर
इस बार लगातार 10 साल सत्ता में रहने के बाद मौजूदा सरकार के खिलाफ असंतोष स्वाभाविक है। सोने की तस्करी और कुछ सहकारी बैंक घोटालों ने सरकार की छवि पर असर डाला है। यूडीएफ के लिए संगठनात्मक कमजोरी के चलते निचले स्तर पर बूथ प्रबंधन और गुटबाजी कांग्रेस के लिए पुरानी चुनौती रही है। पिनाराई विजयन के कद के सामने एक सर्वमान्य चेहरा पेश करना यूडीएफ के लिए कठिन रहा है। उधर राजग के लिए इस बार त्रिकोणीय मुकाबले की केरल की द्विदलीय राजनीति में जगह बनाना अभी भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि राज्य की जनसांख्यिकी को देखते हुए केवल हिंदू मतों के आधार पर जीत हासिल करना मुश्किल है। वहीं ईरान-इजरायल तनाव: मध्य-पूर्व में युद्ध जैसी स्थिति ने प्रवासियों के बीच सुरक्षा और रोजगार को लेकर डर पैदा किया है। जानकारों का मानना है कि यह ‘भू-राजनीतिक अस्थिरता’ भाजपा के लिए नुकसानदेह साबित हो सकती है, क्योंकि मतदाता ऐसे समय में केंद्र की विदेश नीति और राज्य की सुरक्षा को तौल रहे हैं।

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