
अदालत के बाहर भी हो सकेगा संकटग्रस्त कंपनियों का समाधान, प्रवर समिति के सभी 11 सुझावों को मिली जगह
लोकपथ लाइव, नई दिल्ली: भारतीय कॉर्पोरेट जगत और बैंकिंग सेक्टर के लिए सोमवार का दिन ऐतिहासिक रहा। लोकसभा में ‘दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक 2025’ को ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। चर्चा का जवाब देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया कि इस कानून का प्राथमिक उद्देश्य संकटग्रस्त कंपनियों के समाधान की प्रक्रिया को न केवल तेज करना है, बल्कि इसे और अधिक पारदर्शी बनाना है।


इस विधेयक में सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) की समयसीमा को लेकर है। अब किसी भी अपील पर ट्रिब्यूनल को तीन महीने के भीतर अपना फैसला सुनाना अनिवार्य होगा। इससे बीमार कंपनियों के समाधान में होने वाली अनावश्यक देरी से बचा जा सकेगा। वहीं अब कंपनियों के दिवाला मामलों का अदालत के बाहर भी समाधान किया जा सकेगा, जिससे निवेशकों के बीच भारत की साख मजबूत होगी। उन्होंने कहा कि यह संशोधन विधेयक न केवल डूबते हुए कर्ज की वसूली को आसान बनाएगा, बल्कि पर्यावरण संबंधी चिंताओं और न्यायिक अधिकारों के संरक्षण में भी मील का पत्थर साबित होगा।

कर्जदाताओं को मिले अधिक अधिकार
वित्त मंत्री ने बताया कि 12 अगस्त, 2025 को पेश इस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजा गया था, जिसने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंपी। अब तक इस संहिता में सात बार संशोधन किए जा चुके हैं। प्रवर समिति द्वारा सुझाए गए सभी 11 संशोधनों को इस विधेयक में शामिल कर लिया गया है। अब क्रेडिटर समाधानकर्ता की चयन प्रक्रिया में सीधे अपने अधिकारों का प्रयोग कर सकेंगे। विधेयक में किसी भी क्षेत्र या कंपनी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया है, सभी के साथ समान कानूनी व्यवहार सुनिश्चित किया गया है।
‘श्रमिकों के हितों से कोई समझौता नहीं’
विधेयक में सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा का संतुलन बनाते हुए कर्मचारियों और MSMEs का विशेष ध्यान रखा गया है। वित्त मंत्री ने सदन को भरोसा दिलाते हुए कहा कि कर्मचारियों की जितनी भी देयता है, उसे भुगतान में प्राथमिकता दी जाएगी। हम श्रमिकों के हितों से बिल्कुल भी समझौता नहीं करेंगे। निर्मला सीतारमण ने आंकड़ों के साथ बताया कि आईबीसी बैंकिंग सेक्टर के लिए ‘संजीवनी’ साबित हुआ है। बैंकों ने समाधान प्रक्रिया के जरिए अपने आधे से अधिक एनपीए की वसूली कर ली है। उन्होंने दोहराया कि इसका उद्देश्य केवल कर्ज वसूली नहीं, बल्कि संकटग्रस्त कंपनियों का समयबद्ध समाधान कर उन्हें फिर से पटरी पर लाना और देश की क्रेडिट रेटिंग में सुधार करना है।
समय सीमा का सख्त पालन
प्रस्तावित बिल की सबसे बड़ी विशेषता समयबद्धता है। वित्त मंत्री ने बताया कि एक बार किसी कंपनी में ‘डिफॉल्ट’ स्थापित हो जाने के बाद, इन्सॉल्वेंसी आवेदन को 14 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से स्वीकार करना होगा। वर्तमान में, कानूनी पेचीदगियों के कारण इसमें महीनों लग जाते हैं, जिससे संपत्तियों की वैल्यू कम हो जाती है। इस कदम से लंबित मामलों का बोझ कम होने और समाधान प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है
रिकवरी रेट में उछाल और भगोड़ों पर वार
आंकड़ों को साझा करते हुए सीतारमण ने बताया कि 2016 में आईबीसी लागू होने के बाद से बैंकों का डूबा पैसा वापस निकालने की दर 52 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बैंक धोखाधड़ी के खिलाफ सरकार के सख्त रुख का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि ईडी द्वारा 1105 मामलों की जांच में 64,920 करोड़ रुपये की संपत्तियां जब्त की गईं। अब तक 150 आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा जा चुका है। वहीं आर्थिक अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई निरंतर जारी है और उनके लिए कानून में कोई ढील नहीं है।










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